Thursday, 11 February 2016

कुएँ की दुनिया
मेढ़क को
यह हक है कि
वह अपने कुएँ को
अपनी दुनिया समझे
उसमें सुखी-संतुष्ट रहे
लेकिन मेढ़क को
इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती
कि वह बाकी दुनिया को भी
अपने कुएँ में
समेटने की जुरअत करे...
----शिवदयाल
उदारता

मैं इतना उदार नहीं होना चाहता
कि हवा बहे
और एक सूखे पत्ते की तरह
आसमान में उड़ जाऊँ
इसके बदले
मैं क्यों न धरती में जमे
एक नन्हें पौधे की तरह
पवन झकोरों पर उमगता रहूँ...!
-- शिवदयाल

  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...