Monday, 2 November 2015

वार

वे/पहले
मारते हैं शब्दों से,
जुमलों से गोदते हैं
पहले-पहल
जैसे - गद्दार !

तब करते हैं
खंजरों-तमंचों से बार ...!

मालूम है इन्हें
कि अगर कहीं
खाली भी जाये वार  खंजर का
तब भी शब्द
अपना काम करते रहेंगे .....

एक पूरा,
मुकम्मिल इंतजाम है यह
चाँदमारी का
जिसमें शिकार बच निकला
तब भी जीते जी मरता रहेगा !
मारने वाले को और क्या चाहिए ?

जो खेलते हैं शब्दों से
जो रहते हैं शब्दों की दुनिया में
ताज्जुब हैं,
शब्दों की इस भूमिका से
अनजान बने हुए हैं
कि शब्द भी करते हैं काम तमाम
कि जैसे खंजर और तमंचे
जाने कबसे,
जाने कबसे .... !

       --- शिवदयाल
(सामयिक वार्ता में प्रकाशित )

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