प्रतिभा व प्रतिबद्धता के संगम परेश सिन्हा बहुत याद आएंगे
परेशजी नहीं रहे ! कवि,कथाकार,नाटककार ,नाट्य-निर्देशक , ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट , और समाजवादी मूल्यों के प्रति अंत तक प्रतिबद्ध रहनेवाले परेश सिन्हा ! अपने देशकाल पर सजग और चौकस निगाह रखनेवाले और अपने सृजन से सार्थक हस्तक्षेप करनेवाले बुद्धिजीवी परेश सिन्हा। संवेदनशील , हंसमुख, मिलनसार और परदुःखकातर परेशजी अपने समकालीनों में सबसे प्रौढ़ और परिपक्व थे। कभी किसी के पीछे नहीं गए , किसी से कुछ मांगा नहीं, अपनी धुन में लगे रहे।
परेशजी की सृजनात्मकता अनेक विधाओं में प्रस्फुटित हुई , लेकिन उनकी सबसे पुख्ता पहचान नाटककार की रही है। उन्होंने अनेक चर्चित नाटक लिखे - 'गांधी नहीं मरेगा ', ' कटे हुए लोग ',चेहरा दर चेहरा ',आदि। साथ ही अनेक महत्वपूर्ण नाटकों का सफल मंचन किया - 'घासीराम कोतवाल '(विजय तेंदुलकर),'रसगंधर्व '(मणि मधुकर), 'सृष्टि का आखिरी आदमी'(धर्मवीर भारती),'सगुन पंछी '( लक्ष्मीनारायण लाल ), 'दूसरी सीता'(स्नेहलता रेड्डी ), तथा 'इकतारे की आँख ' आदि। परेशजी ने भारतीजी की प्रसिद्ध कविता 'मुनादी' का नाट्य रूपांतरण किया और पटना के आयकर चौराहे पर (जहाँ जेपी पर लाठियां चली थीं) स्थापित जेपी की प्रतिमा के अनावरण के अवसर पर उसका मंचन किया था।
मैं जब अशोक नगर, कंकड़बाग में रहता था तो उनसे अक्सर मिलना होता रहता था। मोहल्ला छूटा तो मुलाकातें भी कम हो गई। पिछले जाड़े में जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के मित्र चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी के साथ उनसे मिलने गया था तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था - ‘अरे, मेरे देवता आ गए!’ देर तक उनसे बातें होती रही। उनके साथ हमने फोटो भी खिंचाई। बाहर निकले तो घर के बाहर निकलकर वे तब तक हमें हाथ हिलाते रहे जबतक कि हम गली से बाहर नहीं निकल गए। हमारा मन भर आया।
एक-ढेड़ महीना पहले मुकेश प्रत्यूष जी से खबर मिली - परेशजी अस्पताल में हैं। मैं भगवती प्रसाद द्विवेदी के साथ उन्हें रेलवे स्पेशियलिटी अस्पताल में उन्हें देखने गया। वे कष्ट में थे, बेचैन थे। कुछ देर की बातचीत के बाद लेटे-लेटे हाथ जोड़ दिए - ‘चलने का वक्त लगता है, आ गया है, गलती-सलती सब मापफ कीजिएगा!’ उनके चेहरे पर अभी तेज था, हमने उन्हें भरोसा दिलाया कि वे जल्दी स्वस्थ होकर घर चले जाएंगे।
बाद में उन्हें दिल्ली ले जाया गया जहां पर गंगाराम अस्पताल में इलाज के दौरान 15 जुलाई, 2015 को उनका निधन हो गया। अपने पीछे वे भरा-पूरा परिवार छोड़ गये हैं। और छोड़ गये हैं अपनी अनेक अप्रकाशित रचनाएं।
समाजवादी आंदोलन के एक और पुरोधा चले गए। इतने विचारशील उतने ही हंसमुख , निस्पृह और मिलनसार परेशजी अनुपस्थिति बहुत खलेगी। यह रिक्ति कभी भर नहीं सकती। उनकी स्मृति को प्रणाम्।
-शिवदयाल
परेशजी नहीं रहे ! कवि,कथाकार,नाटककार ,नाट्य-निर्देशक , ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट , और समाजवादी मूल्यों के प्रति अंत तक प्रतिबद्ध रहनेवाले परेश सिन्हा ! अपने देशकाल पर सजग और चौकस निगाह रखनेवाले और अपने सृजन से सार्थक हस्तक्षेप करनेवाले बुद्धिजीवी परेश सिन्हा। संवेदनशील , हंसमुख, मिलनसार और परदुःखकातर परेशजी अपने समकालीनों में सबसे प्रौढ़ और परिपक्व थे। कभी किसी के पीछे नहीं गए , किसी से कुछ मांगा नहीं, अपनी धुन में लगे रहे।
परेशजी की सृजनात्मकता अनेक विधाओं में प्रस्फुटित हुई , लेकिन उनकी सबसे पुख्ता पहचान नाटककार की रही है। उन्होंने अनेक चर्चित नाटक लिखे - 'गांधी नहीं मरेगा ', ' कटे हुए लोग ',चेहरा दर चेहरा ',आदि। साथ ही अनेक महत्वपूर्ण नाटकों का सफल मंचन किया - 'घासीराम कोतवाल '(विजय तेंदुलकर),'रसगंधर्व '(मणि मधुकर), 'सृष्टि का आखिरी आदमी'(धर्मवीर भारती),'सगुन पंछी '( लक्ष्मीनारायण लाल ), 'दूसरी सीता'(स्नेहलता रेड्डी ), तथा 'इकतारे की आँख ' आदि। परेशजी ने भारतीजी की प्रसिद्ध कविता 'मुनादी' का नाट्य रूपांतरण किया और पटना के आयकर चौराहे पर (जहाँ जेपी पर लाठियां चली थीं) स्थापित जेपी की प्रतिमा के अनावरण के अवसर पर उसका मंचन किया था।
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| परेशजी , प्रियदर्शी और मैं |
परेशजी की पीढ़ी स्वाधीनता के नवोन्मेष में जवान हुई थी जिसकी आँखों में नये , खुशहाल भारत का सपना था। अल्पवय में पिता को खो देने से परेशजी के लिए पढाई-लिखाई के बाद रोजी-रोजगार अनिवार्य तो था लेकिन वे राजनीतिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से शुरू से ही जुड़े रहे । लेखन के क्षेत्र में वे साठ के दशक से सक्रिय थे। इसी दौर में वे समाजवादी आंदोलन से भी जुड़े और बाद में आल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन के पदाधिकारी भी रहे। अनेक साहित्यिक विभूतियों से उनकी नजदीकी रही, खासकर खासकर कथाशिल्पी रेणु से। बाबा नागार्जुन और कमलेश्वर का भी सान्निध्य उन्हें प्राप्त था। सन चौहत्तर ककए आंदोलन में जयप्रकाशजी के आवाहन पर रेणुजी नेतृत्व में रचनाकारों की जो टोली सड़कों पर निकली उनमें परेशजी भी सक्रिय रूप से शामिल थे। उनकी यह नुक्कड़ कविता अबतक लोगों को याद है : ' खेल भाई खेल , खेल भाई खेल / कैसा गजब यह सत्ता का खेल / बेटे के हाथ लगा कार कारखाना /पोसपुत के हाथ आई भारत की रेल..' रोग-शोक झेलते भी परेशजी सृजनरत रहे , गोकि उनकी किताबें जितनी आनी चाहिए थीं, नहीं आयीं। 'जबड़ों की छाँह में ' , उत्तर दो यक्ष ' (कविता संग्रह ), तीन-तरह लोग ( कहानी संग्रह ), 'गांधी नहीं मरेगा '( नाटक संग्रह) उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। उनकी अनेक रचनायें अप्रकाशित हैं : कोई एक सूरज(उपन्यास), टिकोरा(मगही कवितायेँ), तथा दो नाटक संग्रह। उनकी प्रतिबद्धता इन पंक्तियों में झलकती है :'झोंपड़ों पर फूस हम कुछ और देंगे / सरकंडे, खमाची , बांस-बल्ले / और बंधन बांधकर अपनी नसों के/ सृजन को हम एक नया आयाम देंगे ,/इसलिए कि सिरजना ही है / सहज अभ्यास अपना। '
निजी तौर पर मैं उनकी आलोचकीय दृष्टि का कायल रहा हूँ। सौभाग्य मानता हूँ कि मेरी अनेक रचनायें उनकी नज़रों गुजरीं। दिसंबर 12 में पूरा हुए और अबतक अप्रकाशित उपन्यास का उन्हें बहुत इंतजार था। आखिर उनका कहा सच हुआ : 'लगता है कि मेरे जाने के बाद ही आपका उपन्यास आएगा !' चौहत्तर आंदोलन की परिवर्तनकामी धारा पर केंद्रित यह उपन्यास, काश अबतक आ गया होता, मुझे यह अफ़सोस न रहता ! बने रहेें हिंदी के प्रकाशक , और उनके काबिल 'विशेषज्ञ '! उनकी सत्ता व साम्राज्य बना रहे!
परेश जी एक ओर आंदोलन में सक्रिय थे तो दूसरी ओर श्रमसंघ गतिविधियों में भी शामिल थे। 1975 की रेल हड़ताल में उन्हें जेल जाना पड़ा। वे पटना के फुलवारीशरीफ कैम्प जेल में रहें। छूटे तो आपातकाल का समय था। उन्हें फौरन भूमिगत होना पड़ा। इस दौरान वे जगह-जगह घूमते रहे और बम्बई में खासा वक्त बिताया। इसी दौर में उनकी कमलेश्वर से नजदीकी हुई और संभवतः उनका सहयोग भी प्राप्त हुआ। जबकि कमलेश्वर की लाईन एकदम अलग, बल्कि उल्टी थी। कवि गोपीवल्लभ सहाय उनके घनिष्ठ मित्र थे। परेश जी गोपीवल्लभजी के निधन के बाद उनकी पुण्यतिथि पर साहित्यिक आयोजन करते थे। कई वर्षों तक यह क्रम चला, बाद में स्वास्थ्य गिरने लगा तो यह क्रम भंग हुआ।
परेशजी उन्माद की राजनीति से व्यथित रहते थे और करुणा पर आधरित क्रांति की कल्पना करते थे। नब्बे के दशक में हुए सत्ता परिवर्तन से उन्हें बहुत उम्मीदें थी लेकिन शायद तभी उनमें यह स्वीकार जगा - ‘राजा तो राजा ही होगा, राजवंश का हो न हो/ प्रजा दलित शोषित ही होगी, राज कंस का हो ना हो...’
परेशजी उन्माद की राजनीति से व्यथित रहते थे और करुणा पर आधरित क्रांति की कल्पना करते थे। नब्बे के दशक में हुए सत्ता परिवर्तन से उन्हें बहुत उम्मीदें थी लेकिन शायद तभी उनमें यह स्वीकार जगा - ‘राजा तो राजा ही होगा, राजवंश का हो न हो/ प्रजा दलित शोषित ही होगी, राज कंस का हो ना हो...’
मैं जब अशोक नगर, कंकड़बाग में रहता था तो उनसे अक्सर मिलना होता रहता था। मोहल्ला छूटा तो मुलाकातें भी कम हो गई। पिछले जाड़े में जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के मित्र चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी के साथ उनसे मिलने गया था तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था - ‘अरे, मेरे देवता आ गए!’ देर तक उनसे बातें होती रही। उनके साथ हमने फोटो भी खिंचाई। बाहर निकले तो घर के बाहर निकलकर वे तब तक हमें हाथ हिलाते रहे जबतक कि हम गली से बाहर नहीं निकल गए। हमारा मन भर आया।
एक-ढेड़ महीना पहले मुकेश प्रत्यूष जी से खबर मिली - परेशजी अस्पताल में हैं। मैं भगवती प्रसाद द्विवेदी के साथ उन्हें रेलवे स्पेशियलिटी अस्पताल में उन्हें देखने गया। वे कष्ट में थे, बेचैन थे। कुछ देर की बातचीत के बाद लेटे-लेटे हाथ जोड़ दिए - ‘चलने का वक्त लगता है, आ गया है, गलती-सलती सब मापफ कीजिएगा!’ उनके चेहरे पर अभी तेज था, हमने उन्हें भरोसा दिलाया कि वे जल्दी स्वस्थ होकर घर चले जाएंगे।
बाद में उन्हें दिल्ली ले जाया गया जहां पर गंगाराम अस्पताल में इलाज के दौरान 15 जुलाई, 2015 को उनका निधन हो गया। अपने पीछे वे भरा-पूरा परिवार छोड़ गये हैं। और छोड़ गये हैं अपनी अनेक अप्रकाशित रचनाएं।
समाजवादी आंदोलन के एक और पुरोधा चले गए। इतने विचारशील उतने ही हंसमुख , निस्पृह और मिलनसार परेशजी अनुपस्थिति बहुत खलेगी। यह रिक्ति कभी भर नहीं सकती। उनकी स्मृति को प्रणाम्।
-शिवदयाल
