सार्वकालिक प्रासंगिकता के कवि नागार्जुन
- शिवदयाल
नागार्जुन जनसाधारण की भाषा में क्लासिक रचने वाले कवि हैं। कवि-कुल में वह लोक के सबसे सशक्त प्रतिनिधि हैं। वह खुद भी खुद को जनकवि कहते हैं। वह बोलचाल, रहन-सहन, वेशभूषा, और जीवन-दृष्टि के लिहाज से भी भारत की आम जनता के प्रतिनिधि हैं। अपनी फक्कड़ी और घुमक्कड़ी से भी उन्होंने लोक को आत्मसात किया है जो उनकी काव्य भाषा को एकदम अलग मौलिक व्यक्तित्व प्रदान करता है। नागार्जुन की काव्य भाषा उनकी लोकप्रियता का सबसे महत्वपूर्ण कारक है। बोलचाल की भाषा को उन्होंने काव्यात्मक उत्कर्ष प्रदान किया, इस प्रकार अपनी कविता में उन्होंने शास्त्र और लोक का अंतर मिटा दिया। आधुनिक हिंदी कविता को यह उनकी सबसे बड़ी देन है।
नागार्जुन स्वातंत्र्यचेता कवि हैं। उन्होंने किसी की अधीनता स्वीकार नहीं की - न व्यक्ति की, न दल की, न सत्ता की, न ही विचारधारा की। वे सदा जनता के साथ खड़े रहे, जनता का पक्ष ही उनका पक्ष रहा। जनता का दुःख-दर्द और कष्ट-भोग उनका प्रमुख सरोकार रहा। शायद इसीलिए वह अपने समय और समाज के अत्यंत प्रखर आलोचक कवि हैं। जीवन स्थितियों की वह निर्मम आलोचना करते हैं, इसके लिए वे प्रभावी, कभी-कभी हतप्रभ कर देने वाली वक्रोक्तियों का 'विट' या विनोद के रूप में इस्तेमाल करते हैं। उनके विट में देश-काल की विडंबनाएं चित्रित होती हैं। उनकी राजनीतिक कविताओं में इसका अद्भुत रूप देखने को मिलता है। उनकी राजनीतिक कविताओं की विशेषता यह है कि कवि का स्वर मानो आमजन के स्वर में मिल जाता है, कवि मानो जनता की वाणी में बोलने लगता है। भारत के राजनीतिक वर्ग पर नागार्जुन ने बेहद तीखी, विचलित करने वाली व्यंग्योक्तियों का प्रयोग किया है। उन्होंने राजनीतिक परिस्थितियों पर जो तात्कालिक काव्यात्मक प्रतिक्रिया दी, वह भी बेलगाम सत्ता के विरोध की सार्वकालिक प्रासंगिक अभिव्यक्ति बन गई। 'शासन की बंदूक', 'मोर ना होंगे.. उल्लू होंगे', 'पुलिस अफसर' जैसी कविताएं इसका प्रमाण हैं।
अपनी जनपक्षधरता के कारण नागार्जुन निरे शुष्क कवि नहीं है। उनकी कविताएं काव्य में अभिधा की शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। सीधे अभिधा में कही गई बात में भी वे अपूर्व रस-सृष्टि करते हैं। शायद ही उनकी ऐसी कोई कविता हो जिसमें रस-भंग हुआ हो।
उनकी राजनीतिक कविताएं अत्यंत लोकप्रिय हुई हैं, लेकिन नागार्जुन एक संपूर्ण कवि हैं। तीव्र सौंदर्यानुभूति और प्रखर इतिहास बोध उनकी कविता की पहचान है - इनके अभाव में क्लासिक नहीं रचा जा सकता। कथ्य, शिल्प और भंगिमा की दृष्टि से भी उनकी कविताओं का एक विशाल परास है, रेंज है - 'बादल को घिरते देखा', 'कालिदास', 'सिंदूर तिलकित भाल', 'गुलाबी चूड़ियां', 'पांच पूत भारत माता के', 'बहुत दिनों के बाद', 'मेरी आभा है इसमें', 'हरिजन गाथा' से लेकर 'ऋतु संधि' जैसी अमर रचनाएं नागार्जुन की विलक्षण काव्य प्रतिभा का प्रमाण हैं। उन्होंने गांधीजी, लेनिन, नेहरू, भारतेंदु, रवि ठाकुर, इंदिरा गांधी से लेकर कांशीराम और मायावती पर ही नहीं लिखा, अपने प्रिय गीतकार शैलेंद्र पर भी लिखा। उन्होंने तेलंगाना, सर्वोदय और संपूर्ण क्रांति पर भी लिखा। चीनी आक्रमण के समय 'पुत्र हूं भारत माता का..' लिखा तो बेलछी नरसंहार पर भी लिखा।
नागार्जुन ने रचनात्मक स्तर पर, और कवि की भूमिका के स्तर पर भी अपना अलग मूल्य-मान स्थापित किया। वे अपने समकालीनों के लिए ही चुनौती नहीं बने रहे, बल्कि परवर्ती पीढ़ी के रचनाकारों के लिए भी चुनौती बने हुए हैं। (प्रभात खबर, 11 जून 2022 में प्रकाशित)
-sheodayallekhan@gmail.com
