Friday, 7 December 2012

 अंत, अंत हे गर्दनीबाग !

विकास की भेंट  चढ़ते अनेक इलाकों में से एक का आर्तनाद.... 

 1912 में अलग बिहार राज्य बनने के बाद सचिवालय  बना  और वर्ग-2 अधीनस्थ ,वर्ग-3 तथा वर्ग-4 कर्मचारियों के लिए एक  सुन्दर और व्यवस्थित आवासीय कॉलोनी बनाई  गयी हावरा-दिल्ली रेल लाइन के दक्खिन गर्दनीबाग में। लाइन के उत्तर में साहब  लोग बसाये गए जो आज भी आबाद हैं हार्डिंग रोड और उसके  आस-पास। यह इलाका खूब हरा-भरा  और शहर से लगा हुआ है। धीरे -धीरे रखरखाव के अभाव में ,साथ ही  अतिक्रमण के कारण गर्दनीबाग़ का बड़ा  हिस्सा आज बुरी अवस्था  में है।
गर्दनीबाग़ के नवनिर्माण की योजना बनी है जिस से पुराने मोहल्ले का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। इसका
'हेरिटेज कॉलोनी ' के रूप में जीर्णोद्धार हो सकता है जो एक खूबसूरत बात होती .लेकिन विकास के पैरोकारों को यह बात 'सूट' नहीं करती।
साल भर की उम्र से लेकर बाइस साल तक मैं गर्दनीबाग के एक क्वार्टर में रहा। आज भी मुझे वहीँ के सपने आते हैं।
तो यह कविता देखिये : "अंत , अंत हे गर्दनीबाग !"   विकास की भेंट  चढ़ते अनेक इलाकों में से एक का आर्तनाद.... 

 अंत, अंत हे गर्दनीबाग!
                                                                                                                -शिवदयाल

इस वसंत
      अंतिम बार फुलाया है सेमल
      सुग्गों-कठफोड़वों की
      अंतिम चहचहाहट है यह
      सेमल के फूलों की लाल-लाल
       लहलहाहट में
       कैसे लहालोट हो रहे हैं पंछी -
       अंतिम बार, अंतिम बार!

पुटुस की झाड़ियों की
      खटतूरस गंध
      अब हमेशा -हमेशा के लिए
      शेष होने वाली है
      न मालूम
      रंगबदलू गिरगिटान
      अब कहाँ ठौर पाएँगे
      किस देश जाएँगी
      उधेड़बुन में दौड़ लगातीं,
      एक-दूसरे को छकातीं
      ढीठ गिलहरियाँ

अबकी गर्मी तक
     सिरफल वृक्षों को
     अपनी उदारता दिखाने का
     मौका शायद ही मिले
     लू के थपेड़ों से जूझती टिटिहरी
     थक कर किस डाल बैठेगी
     कौन जानता है

ऊँची घास के नम घेरों में
     चें-चें करतीं, जाने क्या सहेजतीं
     खोजतीं-बीनतीं
     पनमुर्गियों का विहार
     अंतिम बार!

कसैले नीम के नन्हें फूलों पर
     मँडराती मधुमक्खियों और
     अमलतास के स्वर्ण-पुष्पों का
     पराग लूटते मदमस्त भौरों का गुँजन
     बस अंतिम बार!

  गोधूलि में
     बूढ़े पीपल पर
     कौओं की यह अंतिम पंचायत!
     चैत-बैसाख की धूप-हवा में पकीं
     कँटीली फुनगियों से लटकती
     गुलाबी, लच्छेदार जलेबियों की
     खग-वृन्द की यह अंतिम दावत!

आम के पत्तों-पल्लवों से
     ढँके-छिपे प्रणयातुर पंडुक
     निकलने वाले हैं
     अंतहीन प्रवास पर
     जाने किस दिशा  में

अगली बार
    अचरज और शोक से देखेंगे
    आसमान में चक्कर काटते
    नई-नई व्यूह रचनाओं का संधान करते
    सुंदर-सजीले बगुले -
    यह वही जगह तो नहीं
    जहाँ पाँख खुजाते, सुखाते
    सुस्ताते और ध्यान लगाते
    बिताया था चातुर्मास

बाल-बच्चों को संग ले
    इस ढूह से उस ढूह घूमते
    रुक-रुक कर मुँह उठाते
    अपनी ही दुनिया को पुनः-पुनः
    देखते-आँकते
    नेवलों की यह अंतिम तफरीह

कहीं कुछ ऊबड़-खाबड़ नहीं
    सब समतल हो जाने वाला है
    अबकी बारिश  में जगह-जगह
    नहीं जमा होंगे पानी के चहबच्चे
    जिनमें अपनी छवि देखने को
    बार-बार उद्धत हो
    झुण्डों में घूमती
    अपनी लंबी पूँछ के भार से दबी जाती
    पुँछल्ली ड्रैगनफ्लाई

अगली बरसात में
    धरती की कोख में ही दुबके रहेंगे
    शरीफ-शीलवान ढाबुस-दादुर
    उनका यह अंतिम मेघ -मल्हार

अपने में खोई कोलतार की
     सूनी सड़कों का एकाकीपन
     चौड़े में जमे गो कि झडे़, उधड़े
     बाबुओं के क्वार्टरों का
     डूबती नब्जों के बीच आत्मालाप
     जिनकी स्मृतियों में अभी जीवित हैं
     अंग्रेज बहादुर और लोहा सिंह
    -यह छोटी होती दुनिया में
     ऊँचे पेड़ों की गरिमा
    -यह सिकुड़ते स्पेस में
     खुले में रहने की जीवटता -
     सब अंत को संक्रमित

राजकुमार की
    चाय की दुकान पर
    चाय की यह रसीली अंतिम घूँट
    आँखों में पानी ला देती
    कड़ाही में तली जाती कचरी की
    यह अंतिम झाँस

जिन्होंने अपनी बुभुक्षा
    और लिप्सा में इस वसुंधरा को
    माता से भोग्या बना दिया
    सब कुछ रौंदता
    अपने घर्घर नाद में
    आर्त पुकारों को सोखता जाता
    ‘नई’, दौलतमंद दुनिया की
    जमीन तैयार करता उनका विकास-रथ
    अब गर्दनीबाग के सीवान तक आ पहुँचा है

अपनी मिट्टी
      हवा, धूप और आकाश
      अपने खग-विहग, जीव-जंतु
      अपनी हरीतिमा और विश्रान्ति
      अपनी खुषबू और फैल
      सुंदरता, कोमलता और नैसर्गिक मोहकता
      अपनी संपन्नता और पूरेपन के साथ
      उत्सर्ग को तैयार है
      गर्दनीबाग -
      जीवन की बहुतेरी छवियों,
      कोमल आहटों और गुंजारों से स्पंदित
      एक मोहल्ला जो बदकिस्मती से
     ‘बेशकीमती जमीन’ पर आबाद है

जिनके देह लगी हो इसकी माटी
     जिनके नासापुटों में बसी हो हरी घास की महक
     जिनका रहा हो यह क्रीड़ांगन
     यहाँ से गुजरते
     ठंडी छुअन से भरा हो
     जिनका जला हुआ मन

जो भुतहा बहेड़ा के नीचे से
     कभी डर कर गुजरे हों
     झड़बेरी और करौंदे की काँटेदार टहनियों से
     जिनकी आस्तीनें छिली हों

जिनके सपनों में आया हो
     बहुरुपिया - कच्चे खाँव
     जो भागे हों फेरी वाले की
     उस आवाज के पीेछे -
     एक पैसे में दो बटन, सिन्दू ऽ ऽ र ऽ ऽ ..   
     जो कभी भय तो कभी जुगुप्सा से
     साधुओं-सँपेरों-फकीरों का चुपके-चुपके
     पीछा करते रहे हों

  जो टमटम की सवारी का मजा लूटते
      घोड़े की पीठ पर पड़ते चाबुक से
      कभी खुद भी दहले हों
      गहन रात्रि में
      टीसन से खाली लौटते
      ताड़ी के नशे में
      सातवें सुर में अलाप लगाते
      टमटम वाले की तान और उस पर
      ताल बैठाते घोड़े की लयबद्ध टापों से
      जिनकी नींद उचटी हो

चितकोहरा पड़ाव पर
      खाली-खाली-सी दोपहरियों में
     अपने खोखे में
     बीड़ियाँ बनाते, बाँधते, सेंकते
     किसी वीतरागी से नसीब मियाँ को
     शाम की कव्वाली में सुर उठाते देख
     जो विस्मित रह गए हों

जिन्होंने यहीं देखी थी कोई छब
     और हमेशा  के लिए खुद को
     रख-छोड़ आए थे यहीं
     सुनते रहे थे जो रात की निविड़ता में
     छायागीत और बिनाका गीतमाला
     जो रोए थे चुपके-चुपके
     जिनकी रह गई बहुत कुछ अनकही

जिन्होंने यहीं की सड़कों पर
        मुट्ठी तानना सीखा था
        जिन्होंने यहीं,
        ठीक यहीं से देखनी शुरू की थी दुनिया
        जिनके केश सन के खेत हुए
        यहीं की धूप में
        जो यहीं से खो जाना चाहते हैं
        बहुत नीले आसमान की निस्सीमता में
        जिनके लिए शुरू होती है
        अनंत की यात्रा यहीं से
  
 उन्हें, उन सबको
        गर्दनीबाग का
       अंतिम प्रणाम्!


(जनसत्ता वार्षिक अंक 2012 में प्रकाशित।)


       

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