Monday, 6 March 2023

लम्बी   कहानी
                                                                 नॉस्टैल्जिया
                                                                                                                         - शिवदयाल

अलबत्ता मैं उससे एकाध बार मिला जरूर हूँ, लेकिन उसे खास जानता नहीं । और तब उसकी कहानी कहना थोड़ा विचित्रा लगता है ।
अगर परितोष के साथ वह भी कैलिफोर्निया न गया होता तो शायद उसकी याद भी नहीं होती मुझे । जब वह परितोष के साथ इंजीनियरिंग कर रहा था, उस भोले-भोले लड़के से परिचय हुआ था । अपने भइया के रूप में जब परितोष ने मुझे प्रस्तुत किया तो उसने कापफी इज्जत बख्शी थी मुझे । भोला-भाला, मासूम, औसत कद-काठी और गहरी आँखों वाला वह आभास बसु । उसने हाथ जोड़कर विनयावनत हो मुझे प्रणाम किया था और मैंने हँस कर उससे हाथ मिलाया था, उसकी पीठ थपथपाई थी -  बड़े भाई की तरह ।
‘‘यह आभास है शरत भइया, रियल जीनियस! लेकिन इसके भोलेपन पर मत जाइएगा । इसी मासूमियत की बदौलत इसने कितने वारे-न्यारे किए हैं। ही इज अ ब्ल्डी किलर !’’ हम हँसने लगे थे ।
‘‘यूँ ही मुझे बदनाम करता फिरता है भइया! आप इसकी बातों में नहीं आइए ।’’ मुझे आभास की बात सच मालूम हुई थी । खैर, वह रेलवे स्टेशन की बात थी, आई-गई हो गई ।
इसके बाद आभास से दूसरी और अंतिम मुलाकात दिल्ली के इंदिरा गाँधी  अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे की लाबी में हुई । परितोष की जिद कि मैं उसे अमेरिका के लिए प्लेन में बिठाने जरूर आउफँ, के आगे मेरी एक न चली थी । लाख व्यवस्तताओं के बावजूद मुझे उसे सी-ऑफ  करने जाना पड़ा । आभास ने मुझे देखा तो लपक कर आगे आया प्रणाम करने - ‘‘भइया, प्रणाम !’’ मैंने कुशल-क्षेम पूछी ।
‘‘मेरी टाँग खींचने के लिए चल रहा है साथ, और क्या ?’’ परितोष ने उलाहना दी तो आभास लगा हँसने।
‘‘ओह, तो तुम भी स्टेट्स जा रहे हो, यह तो बहुत अच्छी बात है ! दिस इज ग्रेट ! तुम्हें बहुत-बहुत बधाई !’’
‘‘भइया, न सिर्फ यह कि यह अमेरिका जा रहा है, बल्कि कैलिफोर्निया की उसी कंपनी को इसने ज्वाइन  किया है जिसका मुलाजिम मैं खुद हूँ । मेरी छाती पर मूँग दलने की इससे बेहतर जगह बताइए, और क्या हो सकती थी !’’ परितोष की बात पर इस बार आभास ठठा कर हँस पड़ा ।
‘‘देखिए भइया, कैसा मरा जा रहा है । मुझे कंपनी में अभी से अपना प्रतियोगी समझने लगा है । देखते हैं आप ! बाप रे, वहाँ जाने कैसे पेश आएगा । मैं तो इसी के भरोसे सात समंदर पार करने निकला हूँ, लेकिन यह तो लगता है दगा देगा भइया! जरा इसे समझाइए न !’’
तभी एक प्रौढ़ दंपति हमारे निकट आए । आभास ने उनसे मेरा परिचय कराया । उसके माता-पिता थे - थोड़े उत्साहित, थोड़े गौरवान्वित, थोड़े चिंतित, थोड़े व्यग्र - बेटा स्टेट्स जा रहा है, एन.आर.आई. बनकर लौटेगा ! मुझसे वे औपचारिक तरीके से मिले, बस हाल-चाल पूछा ।
‘‘यू मस्ट मीट मिस्टर चटर्जी आभास, इफ यू फाइंड ऐनी प्रॉब्लम  ओवर देयर ।’’ आभास के पिता ने उसे सलाह दी ।
‘‘आभास, तुमी रोज एकटा कोरे फोन कॉल  कोरबे, कोरबे तो ? आमार मोन भीषोण विकोल थाकबे !’’
‘‘आभास, माई सन, यू नो, आइ हैड वन्स थॉट ऑफ  गोइंग ओवरसीज फॉर  ब्रेड ऐण्ड बटर, बट आइ कुडंट । नाउफ यू हैव मेड इट, आइ एम रियली अ प्राउड फादर माइ सन! यू हैव गिवेन अस इमेंस प्लेजर ।’’
माता-पिता और पुत्रा को थोड़ा एकांत देते हुए हम दोनों थोड़ा पीछे खिसक आए थे । परितोष अब गंभीर था । लाबी में चहल-पहल बढ़ रही थी ।
‘‘ओए, तुमने वो सरसों दी साग वाली टिपिफन कित्थे रखी है ?’’ बगल में एक सरदारजी अपनी सरदारनी से पूछ रहे थे ।
‘‘मैं जी सूटकेस की चाबी ढूँढ़ रही हूँ और आप हैं कि सरसों दी साग के पीछे पड़े हैं ! हुँह !’’ सरदारनी ने तुनक कर कहा ।
‘‘ओए, मैं केया, वो घी दा डब्बा तो ठीक से बंद किया है ?’’
‘‘आप खुद क्यों नहीं देख लेते! जब पंजाब आएँगे, बस खाने दी पिफक्र में ही तुसी रहते हो । जरा मेरी हैल्प तो करते नहीं ।’’ सरदारनी बड़बड़ाती हुई बैग-दर-बैग अपनी खोई हुई चाभी टटोलने लगी । हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा तो मुस्करा पड़े । तभी एक दक्षिण भारतीय, संभवतः कन्नड़ परिवार ने हमारा ध्यान खींचा । लगता था, वे किसी बात को लेकर एक-दूसरे को कुछ समझाने की विफल कोशिश कर रहे थे, लेकिन ताज्जुब की बात थी कि उनमें से कोई खीझ नहीं रहा था ।
हमारे ठीक बायीं ओर दो व्यक्ति आकर खड़े हुए । बड़े संजीदा लग रहे थे दोनों । एक बार-बार एअरपोर्ट की घड़ी देख रहा था, दूसरा रह-रहकर अपने से उम्र में कहीं छोटे उस पहले को निहार लेता था जैसे ।
‘‘वक्त खराब चल रहा है, संभल कर रहना । अपने काम से काम रखना। फालतू लोगों से मेल-जोल नहीं करना। समझ रहे हो सुल्तान ? ... और देखो, मशरूपिफयत में कहीं हमें भुला नहीं देना ।’’
‘‘आप खामख्वाह जज्बाती हो रहे हैं भाईजान ? ... बस, दो सालों की तो बात है, यूँ गुजर जाएँगे । आप पर सब कुछ छोड़े जा रहा हूँ, सब कुछ आप ही को देखना है । इंशाल्लाह, कुछ बन के ही लौटूँगा भाईजान !’’
‘‘और देखो, अम्मी लड़की पहले ही पसंद कर चुकी हैं । उनका दिल न तोड़ना ...’’
वहाँ पूरा हिन्दुस्तान इकट्ठा था । ये अलग-अलग क्षेत्रीय व भाषाई पहचानें महासागरों के उस पार एक हो जाने वाली थीं µ सिपर्फ इंडियन रह जाने वाली थीं ! इंडियन ! इस अंतिम पहचान से वे बस चंद घंटों के फासले पर थे ।
सिक्योरिटी चेकप की घोषणा के साथ ही हलचल बढ़ी ।
‘‘मैंने इसीलिए जिद की थी, अगर आप नहीं आते तो इस पहली विदेश यात्रा में मुझे विदा करने कोई नहीं आता शरत भइया ! ... आपने मुझ पर बहुत उपकार किया । आइ एम रिअली ग्रेटपफुल !’’ अपनी मुस्कान में भी परितोष अपनी भावुकता को न छिपा सका ।
मुझे तो आना ही था परितोष ! ऐसी क्या बात कर दी मैंने ! दिस इज अ प्रिविलेज टू मी सीइंग यू आॅपफ पफाॅर यू.एस.! मैं खुश हूँ बहुत ! खूब आगे बढ़ो, तरक्की करो, आॅवर आॅल बेस्ट विशेज...’’
‘‘भाभी को प्रणाम बोलिएगा । श्रुति के लिए जल्दी ही कुछ भेजूँगा ! चाचा-चाची को भी प्रणाम कहिएगा। चलता हूँ ?’’ वह मेरे चरण छूने को झुका तो मैंने उसे छाती से लगा लिया µ ‘‘इतनी दूर जा रहा है यह लड़का, भगवान इसकी रक्षा करना !’’
मैं परितोष से अलग ही हुआ कि आभास सामने आ गया ।
‘‘आपसे ज्यादा बातें न कर सका भइया । फिर कभी ...’’ उसने प्रणाम किया और मैंने उसे भरपुर शुभकामनाएँ दीं । अपनी गहरी आँखों से उसने कृतज्ञता प्रकट की और परितोष के साथ आगे बढ़ गया । मैं अपने आप में लौटा ।
आभास के माता-पिता मेरे साथ एअरपोर्ट के बाहर आए । दोनों उदास थे, दोनों के बीच जैसे कुछ ठहर गया था । वैसे मैं अनायास ही उनके साथ हो गया था, बाहर आकर मेरा ध्यान इस पर गया । मैंने उनसे विदा लेनी चाही कि आभास की माँ आँखें पोंछते तल्ख लहजे में बोलीं -
‘‘कि गो ? मोने शांति होएचे तो ? हमारा एकला बच्चा को एतना दूर भेज दिया !’’ सहसा वे मेरी ओर मुखातिब हो फफक पड़ीं ।
‘‘की सीन क्रिएट कोरे जाच्चो ! ए नहीं सोचता हाय कि लरका का जिंदगी बन जाएगा । एतना अच्छा कंपनी ज्वायन किया । हम पूरा जिंदगी में जेतना नहीं कमाया, ओतना ओ साल भर में कमाएगा । यहाँ रहकर ओ क्या कोरेगा ? जोग्य आदमी को यहाँ कौन पूछता है ? क्या ओपोर्चुनीटी  है इधर  ? बताइए, आदमी बाइरे जाता है तो आँख से आँसू गिराना केतना खराब बात है !’’ अब पति-पत्नी के बीच मैं खड़ा था - दुविधग्रस्त । मैंने बीच का रास्ता निकाल कर खिसक लेने में ही भलाई समझी ।
‘‘देखिए, माँ का दिल है, थोड़ा तो तड़पेगा ही । अब जब आभास वहाँ से अपना हाल देगा  - अमेरिका से, तो इन्हें भी महसूस होगा कि बेटा अपना भविष्य सँवारने ही लगा है । फिर, कोई वहाँ बसने तो गया नहीं। कुछ सालों में आ जाएगा । तो मैं चलूँ !’’ उन्हें नमस्ते कर मैंने अपना राह पकड़ी ।
यह सितंबर 11 ;2001द्ध के पहले की बात है । अमेरिका जाने के कुछ ही दिनों बाद परितोष ने मुझे संदेश भेजा था कि वह ठीक से है । मैं उसको जवाब भी नहीं भेज सका था । चार-छह महीने यों ही गुजर गए । बैंक की नौकरी में इन दिनों ज्यादा कुछ सोचने-समझने और करने को समय नहीं रहता । उदारीकरण और निजीकरण के दौर ने हवा खराब कर रखी है । बैंक की नौकरी तो अब जैसे मारवाड़ी की नौकरी बन कर रह गई है ।
एक दिन ई-मेल पर परितोष का जरा एक लंबा संदेश मिला । लिखा था कि काम की व्यस्तता में मौसम और माहौल की प्रतिकूलता और अजनबीयत पर ध्यान ही नहीं जाता । काम ऐसा कि जाने का समय निश्चित है - एकदम आठ बजे, लेकिन आने का कोई समय नहीं । शाम आठ बजे कि दस बजे कुछ कहा नहीं जा सकता । कंपनी ने रहने की व्यवस्था कर दी है, खाने-पीने का प्रबंध् स्वयं करना पड़ता है । गनीमत है कि आभास को किचेन में कुछ-कुछ ‘ट्राई’ करने में आनंद आता है। मेल में सबसे अंत में लिखा था -  ‘‘शुभांगी ने अपनी शादी में तो जरूर बुलाया होगा, कैसे रहा ? मुझे निमंत्रण तो नहीं लेकिन सूचना मिली थी । निमंत्रण मिलता भी तो मैं भला कैसे आ सकता था ! ...’’
परितोष और शुभांगी बड़े अच्छे दोस्त थे, जैसा कि परितोष ने खुद मुझे बताया था । बल्कि अक्सर उसकी बातों में शुभांगी का जिक्र आता रहता । पढ़ाई तो दोनों ने साथ-साथ की ही, नौकरी भी दोनों को लगभग साथ ही साथ मिली, गोकि अलग-अलग कंपनियों में । किसी पार्टी में परितोष ने उससे परिचय कराया था । वहाँ से लौटते हुए मैंने उसे कुरेदा था - ‘‘लड़की तो अच्छी मालूम पड़ती है यार ! खाली दोस्ती-वोस्ती तक रहोगे या आगे भी बढ़ोगे ?’’ परितोष हँसने लगा, लेकिन उसकी हँसी मुझे खाली नहीं लगी । मुझे लगा कि कुछ है जरूर ।
‘‘मिलो इनसे, ये मेरे मेन्टर हैं’’ ... शुभांगी से कुछ इस तरह परितोष ने मिलवाया तो उसने कुछ जुगुप्सा से मुझे देखा था । मैं अपने लिए इस्तेमाल किए गए इस विशेषण से थोड़ा चकित था । वास्तव में मैंने परितोष और अपने बीच के संबंध् को कभी इस नजरिए से देखा नहीं था । हम दोनों दो जरूरतमंद थे, बहुत फासले पर भी नहीं रहते थे । परिचय तो लड़कपन का था । हमारे बीच उम्र का थोड़ा फासला था, वह मुझसे पाँच-छह वर्ष छोटा होगा लेकिन फुटबाल मैच में हम दोनों ही अपनी-अपनी टीमों के साथ एक-दूसरे से भिड़ते । वह तब भी हमें भइया ही कहता, मैंने भी उसे फुटबाल के कई गुर सिखाए । बाद में पढ़ाई खत्म करने और नौकरी में आने के दरम्यान मैं एक कोचिंग संस्थान में अँग्रेजी पढ़ाता था । इंटर करके परितोष भी वहाँ पढ़ने आने लगा । शुरू से ही वह हँसमुख और मिलनसार लड़का रहा । रोज-रोज की मुलाकात से वह जल्द ही घुल-मिल गया । वह मेरे घर भी आने लगा । घर पर ही एक दिन उसने मुझे इंजीनियरिंग की तैयारी में सहयोग करने का अनुरोध किया । मैं अंग्रेजी का आदमी ठहरा, पूछा - मुझे तो साइंस तो आती ही नहीं । कहने लगा - नहीं, जुगाड़ कर दीजिए, बहुत पैसा माँग रहे हैं, पापा देने को तैयार नहीं हैं । संयोग से एक कोचिंग वाले मेरी रिश्तेदारी में ही निकल आए । उनसे मिन्नतें करके मैंने परितोष का दाखिला वहीं करा दिया। उसकी किस्मत अच्छी थी और मेहनत भी उसने खूब की । वह इंजीनियरिंग में दाखिले का इम्तहान पास कर गया । इसके पहले किस्मत मुझ पर इस कदर मेहरबान हुई कि मुझे बैंक की नौकरी मिल गई, ऊपर से पोस्टिंग  भी अपने ही शहर में । अनुभव किया, दुनिया मुट्ठी में होने का क्या मतलब होता है ।
ट्रेनिंग खत्म हुए अभी साल भर नहीं बीता था कि परितोष वह खबर ले आया था  - इंजीनियरिंग में हो गया है ! बड़ी खुशी हुई लेकिन उस दिन कुछ विचित्र-सी बात उसने कही । वैसे तो वह अच्छे खाते-पीते परिवार से था लेकिन उसके ऐडमिशन में जो लाख रुपया लगने वाला था उसके जुगाड़ में दिक्कत पेश आ रही थी । उसका बड़ा भाई जो बेकार था, बाप से परचून की दुकान खोलने के लिए पैसे की जिद किए बैठा था । पिता असमंजस में थे, क्या करें !
बैंक में पर्सनल लोन का स्कीम आया हुआ था । मुझे ध्यान आया तो मैंने परितोष से कहा कि वह अपने पिता को बैंक से कर्ज लेने के लिए तैयार करे । इससे दोनों लड़कों का कल्याण हो जाने वाला था, और हो भी गया । जूझना मुझे ही पड़ा, सारे कागज-पत्तर बनवा कर लोन पास करवाया, वह भी दस दिन के अंदर, और परितोष इंजीनियरिंग पढ़ने चला गया ।
क्या इतने से आदमी किसी का ‘मेन्टर’ कहलाने का हकदार हो जाता है ? क्या पता ! मेरे लिए तो परितोष का स्नेह और सम्मान से ‘शरत भइया’ पुकारना ही काफी लगता है, बल्कि जमाने के हिसाब से यह भी कुछ ज्यादा ही लगता है ।
हाँ, शुभांगी ! अब लक्ष्य करता हूँ कि परितोष की बातों में शुभांगी के प्रसंग एकदम से घटने लगे थे । यह उसके कैम्पस सेलेक्शन के बाद की ही बात है। परितोष ने एक दिन यूँ ही उसका जिक्र आने पर बताया कि वह नहीं चाहती कि वह, यानी परितोष स्टेट्स जाए । मुझे अचंभा हुआ । पूछने पर जो बातें सामने आईं उनसे मन बहुत खिन्न हुआ ।
शुभांगी परितोष को पसंद करती थी । लेकिन वह नहीं जानती थी कि वह उसे प्यार भी करती है या नहीं । उधर परितोष शुभांगी से प्यार करता था लेकिन वह तय नहीं कर पा रहा था कि उसे उससे विवाह भी कर लेना चाहिए या नहीं । एक बार दोनों ने साथ बैठकर सोचा-विचारा और आखिरकार तय किया कि वे दोनों शादी कर सकते हैं । यह न्यूनतम सहमति बनी - शादी ! शुभांगी जिस कम्पनी में थी उसी में अभी पैर जमाना चाहती थी और उस कम्पनी का कारोबार भारतवर्ष सहित दक्षिणपूर्ण एशिया के देशों में था । उसे पति ऐसा चाहिए था जो सपोर्टिव, यानी सहायक तो हो ही, ज्यादा से ज्यादा समय उसके साथ भी रह सके । परितोष की पहली प्राथमिकता थी बाहर जाकर कैरियर बनाना और पैसा कमाना, विवाह बाद की बात थी । उसे लड़की ऐसी चाहिए थी जो उसके लिए भारत में दो-चार वर्ष इंतजार कर सके, लेकिन वह शुभांगी के लिए इतना कन्सेशन करने के लिए तैयार था कि वह स्टेट्स जाने के पहले ही उससे विवाह कर लेता । यानी शुभांगी से विवाह करके उसने स्टेट्स जाने के लिए किसी तरह अपने को तैयार कर लिया था । अब गेंद शुभांगी के पाले में थी । शुभांगी परितोष से शादी करने को तो तैयार थी लेकिन स्टेट्स जाने को कतई तैयार नहीं थी । वह कैरियर को लेकर अभी कोई जोखिम उठाना नहीं चाहती थी । विकट स्थिति थी । आखिरकार कोई रास्ता न निकलता देख दोनों ने रिश्ते (!) को एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना बेहतर समझा !
उसकी अपनी ही कोई पीर होगी, परदेस में कुछ याद आ गया होगा तो मुझे पूछ भेजा कि शुभांगी का विवाह कैसा रहा ! वरना मुझे शुभांगी भला क्यों आमंत्रित करने लगी ?
जमाना किस तेजी आगे निकल रहा है । आजकल शायद सात-आठ वर्ष के अंतर से ही पीढि़याँ बदल जाती हैं । एक शादी में हमने एक-दूसरे को देखा था, दिल में चाहत पैदा हो गई थी । पता-ठिकाना मालूम किया । आग उधर भी  थी। हम मिलने लगे, पहले लोगों-परिचितों के साथ, फिर अकेले में भी । मैंने श्रद्धा  से पूछा  - ‘‘क्या कहती हो, मुझसे शादी करोगी ? मेरी तो नौकरी नहीं है, इंतजार कर सकोगी ? बस साल भर ? फिर चाहो तो किसी और की हो जाना । मैं तुमसे कोई शिकायत नहीं करूँगा ।’’
उसके जवाब में बड़ा वजन था । मुझे इसकी उम्मीद नहीं थी - ‘‘अगर मुझे तुमसे शादी करनी है तो करनी है । इसमें तुम नौकरी और टाइम फ्रेम  की शर्तें  क्यों ले आए ? ऐसी बातें तो ग्राहक और दूकान वाले के बीच हुआ करती हैं । हम दोनों के बीच भी ऐसी बातें होंगी ?’’ मैंने उसे देखा और झेंप कर फिर  नजरें नहीं उठाई । हमारा विवाह हुआ । मुझे मालूम है, बाबूजी ने पिछले दरवाजे से  श्रद्धा के घरवालों से कुछ दहेज वगैरह भी वसूल ही लिया । फिर भी हमने बुरा नहीं माना । अबतक प्यार और तकरार का सिलसिला बरकरार है ।

और अब आभास बसु, जिसे मैं परितोष के माध्यम से ही थोड़ा-बहुत जानता हूँ, और जिससे मैं अंतिम बार दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर कोई चार-एक साल पहले मिला था ।
सितंबर 11 घटित हो चुका था । अबतक की सबसे बड़ी आतंकी कार्रवाई में कोई तीन हजार लोग मारे गए थे। दुनिया सिहर रही थी। आतंक के खिलाफ विश्वव्यापी युद्ध  का ऐलान किया जा चुका था । फिलहाल निशाने पर अफगानिस्तान था । सहसा मुझे परितोष का ध्यान आया । तीन-चार दिनों तक कोशिश करने के बाद उससे इंटरनेट पर सम्पर्क हुआ । वह खुद तो ठीक था लेकिन आभास को लेकर परेशान था । आभास कम्पनी के काम से बाहर गया हुआ था और अब तक वापस नहीं लौटा था । उन दिनों अमेरिका में एशियाई लोगों को शक की निगाह से देखा जा रहा था, कुछेक जगहों पर उन पर हमले भी हुए थे, खास तौर पर दाढ़ी और पगड़ीधरियों पर ।
इसके कोई दो-तीन महीने के बाद परितोष विदेश जाने के बाद पहली बार भारत आया, बीमार पिता को
देखने । मुझसे मुलकात हुई तो वह तो पहले अमेरिका से लेकर भारत तक में सुरक्षा जाँच के अपने अनुभवों का ही बखान करता रहा, कुछ लतीफे सुनाने के अंदाज में । हम भी उसका रस लेते रहे, फिर बातचीत अफगानिस्तान और तालिबान पर आ गई । वहाँ अमरीकी और ब्रिटिश फौजों ने अपनी कार्रवाई शुरू कर दी थी ।
मुझे तभी आभास का ध्यान आया । मैंने उससे पूछा  - ‘‘तुम्हारा वह बंगाली दोस्त कैसा है ?’’
‘‘ओह मैंने तो आपको बताया ही नहीं । ट्विन टावर कहाँ तो गिरा न्युयॉर्क  में, आभास बेचार फँस गया बोस्टन में !’’
परितोष ने जो कुछ बताया उसके अनुसार हवाई जहाज में बम होने के शक में अन्य यात्रियों समेत आभास को भी उतार लिया गया । जहाज की सघन जाँच हुई लेकिन कुछ नहीं मिला । मुश्किल तब हुई जब आभास समेत तीन यात्रियों को रोककर अन्य को जाने दिया गया । आभास के अलावा रोके जाने वालों में एक नौजवान सिख था जो कनाडा का नागरिक था, और दूसरा एक पाकिस्तानी प्रोफेसर था, अधेड़ वयस का । इन तीनों से आठ-दस घंटे तक सुरक्षा एजेंसी वालों ने पूछताछ की । इनके अंडरवेयर और जूतों तक की तलाशी ली गई । घड़ी और कलम को ठोक-बजाकर देखा गया, मोबाइल जब्त करके जाँच करने के लिए भेजा गया । घर का अकेला, दुलारा लड़का आभास हठात् आई इस विपत्ति से एकदम घबरा गया । वह 12 सितंबर 2001 की सुबह थी, पिछले दिन के धमाकों की गूँज अबतक फिजा में तारी थी, जैसे हर चीज हिल रही थी। आभास बसु का अस्तित्व ही जैसे हवा में झूल रहा था । अपने को निर्दोष साबित करने के लिए उसके पास जब शब्दों का कोष खत्म होने लगा तब कातर होकर वह कहने लगा - ‘‘.... मैं इंडियन हूँ, मैं हिन्दू हूँ। हिंदू ! मैं अब्बास नहीं, आभास हूँ । मैं एक कंप्यूटर इंजीनियर हूँ और रोजी-रोटी के लिए आपके देश आया हूँ ..., मैं यहाँ किसी को नहीं जानता, मैं इंडियन हूँ, हिंदू हूँ !’’
सुरक्षा अधिकरियों  पर सके अनुनय-विनय का असर भले न हुआ हो, उसके मोबाइल फोन के सिम कार्ड की जाँच से तसल्ली हो गई । दस घंटे तक रोके रखने के पश्चात उससे कहा गया - अब तुम जा सकते हो !
आभास बसु ने एक होटल में जागकर वह रात बिताई - पत्ते की तरह काँपते हुए । उसने अपने बाॅस को फोन पर इस घटना की जानकारी दी । उसकी वापसी की व्यवस्था की गई । परितोष को देखते ही उससे लिपट कर वह रोने लगा ।
‘‘मुझे अब यहाँ नहीं रहना परितोष । मेरे लौटने का इंतजाम करो ।’’
‘‘क्या बच्चों-सी बात करते हो । देखते हो, अभी एक खास तरह की परिस्थिति पैदा हो गई है, हर आदमी शक के दायरे में आ गया लगता है ।’’
‘‘हर आदमी ? हर आदमी मतलब? सिर्फ एशियंस को पकड़ते हैं । मुसलमानों को, सरदारों को पकड़ रहे हैं, उनसे मारपीट कर रहे हैं ।’’
‘‘तुमसे मारपीट तो नहीं की न ?’’
‘‘जाने दो परितोष, तुम नहीं समझ सकते !’’ नाराज होकर आभास वहाँ से चला गया और पूरे दिन परितोष से उसने बात नहीं की । दूसरे दिन उसने एक महीने की छुट्टी की दरखास्त दी, माँ की बीमारी को कारण बता कर । किसी तरह पंद्रह दिन की छुट्टी मंजूर हुई । तब उड़ानें अस्त-व्यस्त थीं, सामान्य होने में एक-डेढ़ महीना लग गया । भारत-प्रस्थान की पूर्व संध्या पर उसने परितोष के साथ ड्रिंक्स लिया, और खूब लिया । दो-एक सहकर्मी और आ जमे । उसने किशोर कुमार और हेमंत कुमार के गाने गाए, रवीन्द्र नाथ ठाकुर के कुछ गीत याद करने की भी कोशिश की । अमरीकी लड़कियों के बारे में अपनी राय जाहिर की और वहाँ बसे भारतीयों को अचानक गलियाना शुरू कर दिया ।
‘‘... यहाँ सुविधाएँ चाटने के लिए सी-ग्रेड सिटीजेन बनकर भी खुशी-खुशी रहते हैं और ऐसा दिखावा करते हैं मानो जन्म-जन्मांतर से इनके पुरखे यहीं रहते चले आए हों ।’’ अब यह एक दुखती रग थी, कुछ लोगों को नागवार गुजर सकती थी । शाम की शराब का मजा खराब न हो जाए, इसलिए परितोष ने उसे रोकने की कोशिश की -
‘‘छोड़ो भी यार, तुमने ज्यादा पी ली है । अपनी उस गर्लफ्रेंड  के बारे में तो कुछ बताते नहीं और बेकार की बातें किए जा रहे हो । क्या नाम है उसका आभास ? सपना ! सपना न? ’’
‘‘कौन सपना, कैसा सपना परितोष ? उसे तो एक अमेरिकन लौंडा चाहिए जो नाम से, और शक्ल से इंडियन हो। तुमने पूँछकटे कुत्ते को कभी देखा है ? कभी-कभी देसी कुत्तों के मालिक अपने कुत्तों की पूँछ काटकर उसे जमीन में गाड़ देते हैं, उनका विश्वास है कि इससे उनका कुत्ता कहीं नहीं भागेगा, जीवन भर उनकी चैखट पर भौंकता रहेगा । सपना को हमेशा डर लगा रहता है कि मैं इंडिया लौट जाऊँगा । अगर मेरी भी पूँछ होती तो उसे काटकर अपने अहाते में बोगनवेलिया के झुरमुट में दबा देती । हा...हा...हा...’’ उसकी बात सुनकर सब हँसने लगे ।
‘‘मुझे तो इन दिनों कोई और याद आता रहता है । वह, जिसे मैंने कभी गंभीरता से नहीं लिया, जिसकी हमेशा अवहेलना की ...’’ स्काॅच की एक और घूँट भर कर वह चुप हो गया ।
‘‘लौट कब रहे हो ?’’ परितोष ने पूछा ।
‘‘लौटूँ कि टेररिस्ट होने के शक में कहीं भी किसी भी क्षण पकड़ लिया जाऊँ ?’’ अचानक वह तैश में आ गया ।
‘‘तुमने तो उसको इश्यु ही बना लिया यार । देखो, यह सब कोई पर्मानेंट चीजें नहीं है । कुछ ही दिनों में सब ठीक हो जाएगा । इसके चलते तुम अपनी जिंदगी के फैसले नहीं बदल सकते ।’’
‘‘कुछ ठीक नहीं होगा । इनके पैदा किए भस्मासुर जब तक हैं तब तक ऐसे ही चलता रहेगा ।’’
‘‘फिर भी ... तुम लौट जरूर आना ।’’
‘‘देखूँगा ।’’ कहकर आभास निढाल हो गया ।

पटना में आभास उन्मुक्त हो घूमता-फिरता रहा । इस बार उसने एक सैलानी के नजरिए से जैसे अपने शहर को देखा । जैसे बरसों बाद उसने अपना होना महसूस किया । अपना होना - यह तो अमेरिका में कभी नहीं होता, चाहे जितना पैसा खर्च कर लो लेकिन लगता नहीं कि तुम कुछ हो, तुम्हारी भी कुछ वकत है। उपलब्ध्यिों के सोपान संतुष्ट नहीं करते, उल्टे भूख बढ़ती चली जाती है । पूँजी और तकनीक का ऐसा संयोग हुआ है कि उपभोग की तृष्णा का शमन नहीं होता बल्कि वह और बलवती होती जाती है । जितना बड़ा भोग, उतनी बड़ी उपलब्धि।
हफता-दसदिन यों ही गुजर गया । दोस्तों-रिश्तेदारों ने आभास की खूब आवभगत की । अमेरिका और बुश, क्लिंटन और मोनिका लेविन्स्की पर खूब चर्चाएँ हुई, इतनी कि वह उकता गया । कई लोगों ने उसकी तनख्वाह के बारे में भी जिज्ञासा प्रकट की, उसने उतना ही बताया जिसमें वे चौंक न पड़ें और उस पर अविश्वास न करने लगें । आभास अब विशिष्ट व्यक्ति बन गया था ।
‘‘आभास तुम्हारा प्रोग्राम क्या है, वहाँ कोई दिक्कत तो नहीं होगी ? तुम्हें यहाँ आए पंद्रह दिन हो रहे हैं ।’’ उसके पिता ने पूछा तो थोड़ी देर के लिए वह चुप रहा ।
‘‘अभी रहना है ? रिटर्न टिकट वगैरह सब कैसे होगा, कुछ इंतजाम किया ?’’
‘‘अभी मैं हूँ । मैं सब कर लूँगा !’’ उसने धीरे-से जवाब दिया ।
‘‘ओह, दैट इज फाइन देन !’’ पिता को इत्मीनान हुआ । माँ बगल में आकर बैठ गईं, उसका सिर छूती हुई । आभास ने अब तक बोस्टन वाली घटना का जिक्र नहीं किया था, यह सोचकर कि इससे माँ-बाप बेकार ही घबरा जाएँगे और बात बाहर भी चली जाएगी, लेकिन माँ की ममता पाकर वह सहसा कुछ भर आया । तभी माँ ने उसे सूचना दी -‘‘तुम्हारे बाबा वाॅल्यून्टरी रिटायरमेंट के लिए अप्लाई कर रहें हैं । कहते हैं अब नौकरी करके क्या होगा । हमारे तो एकमात्रा सहारा तुम हो, जहाँ तुम रहोगे वहीं हमें रहना है ।’’
‘‘हाँ, आभास, वैसे भी नौकरी में बहुत प्रेशर है । नया जमाना है, नए तौर-तरीके हैं । वैसे भी क्या पता कब हमारी कंपनी किसी धनसेठ के हाथों बिक जाए ! सोचा, अब मुक्त ही हो लूँ । अगले महीने से वीजा-पासपोर्ट के लिए कोशिश शुरू कर दूँगा ।’’
आभास को सदमा-ला लगा । वह बिस्तर पर लेटा था, अचानक उठ बैठा और अविश्वास से माँ-बाप को देखा । वे मुस्करा रहे थे, अपने सुयोग्य, सुदर्शन पुत्र को प्यार से निहार रहे थे ।
‘‘लेकिन यह सब अभी करने की क्या जरूरत है । आप अभी वी.आर. नहीं लीजिए, वीजा-पासपोर्ट भी बाद में बनता रहेगा ।’’ माँ-बाप थोड़े विचलित हुए, चेहरे की उत्फुलता गायब हो गई ।
‘‘तो तुम हमें क्या अपने साथ नहीं रखना चाहते ?’’ माँ की आँखें भर आईं ।
‘‘क्या कहती हो माँ ! रहने की जगह बस एक अमेरिका ही बची है ? अपने देश में, इसी धरती पर हमारा गुजारा नहीं हो सकता ?’’
‘‘यह क्या कह रहे हो तुम ? क्या बात है ? तुम्हें नौकरी से निकाल दिया या तुमने नौकरी छोड़ दी ?’’ पिता ने सशंकित स्वरों में पूछा ।
‘‘न ही मैंने नौकरी छोड़ी है, न ही मुझे निकाला गया है, दरअसल मेरा मन नहीं लगता वहाँ । मैं लौटना नहीं चाहता !’’
‘‘क्या बेवकूपफी की बातें करते हो । लोग इसके सपने देखते हैं, अमेरिका लोगों के ख्वाब में आता है और तुम बिना बात यह अवसर गँवाना चाहते हो ! दिस इज बीइंग अ नाॅस्टैल्जिक इडियट । ... " पिता नाराज हो गए । आभास का गला रूँध गया । वह अपने को अचानक अकेला महसूस करने लगा । माँ बात ताड़ गई, उसे अंक में भर लिया । आभास फफक पड़ा - ‘‘माँ, मैं वहाँ नहीं जाना चाहता, वहाँ मेरा दम घुटता है । ... मुझे वहाँ बोस्टन में दस घंटे टाॅर्चर ...’’ आभास ने वह पूरा प्रकरण सुना डाला, इसके अलावा भी दर-दुकानों में, सार्वजनिक स्थानों पर कभी-कभी जो उसे हीनता-बोध हुआ था, या कराया गया था, वह भी बखान कर गया ।
माता-पिता को क्लेष हुआ। उन्होंने बेटे को सांत्वना दी, हौसला बढ़ाया और अमेरिका या नौकरी-चाकरी की और कोई बात नहीं की ।
आभास अब तक देवयानी से नहीं मिला था । वह उसके दूर के रिश्ते में आती थी और बरसों उसके पड़ोस में रही थी। उसकी माँ अक्सर बीमार रहतीं और देवयानी प्रायः घर के कामों में ही व्यस्त रहती - छुटपन से ही । उसने पहली बार जब खीर पकाना सीखा था तो कटोरे में सबसे छुपा कर आभास के लिए ले आई थी । आभास तब नवीं-दसवीं में पढ़ता होगा ।
‘‘यह लो, पहली बार मैंने खीर पकाई है, और सबसे पहले तुम्हें चखा रही हूँ ।’’ देवयानी ने खीर की कटोरी बढ़ाई तो आभास उसकी कीमत का अंदाजा नहीं लगा सका । खीर चखकर बोला - ‘‘अच्छी बनी है, लेकिन कुछ फीकी रह गई । क्यूँ, चीनी माँ ने कम दिया था क्या ?’’ देवयानी ने इसका बुरा माना होता तो आभास को हाथ की पकाई चीज खिलाने का सिलसिला नहीं बन पाता । देवयानी आभास के लिए घर से छुपाकर अपने हाथ की बनाई चीजें लाती और उसे खाते देख जैसे खुद तृप्त होती रहती । आभास उसे अपनी ओर एकटक देखता पाकर कभी-कभी संकोच महसूस करता और उससे भरसक बचने की कोशिश करता । देवयानी को जैसे इसका कोई मलाल नहीं होता । हाँ, एक बार उसके खीझने पर जरूर देवयानी रो पड़ी थी । आभास की नई और कोरी काॅपियों पर देवयानी ने खूबसूरत अक्षरों में उसका नाम लिख दिया था - आभास बसु ! बस इतनी-सी बात पर आभास चिढ़ गया था ।
देवयानी का परिवार जब किराए का मकान छोड़कर अपने मकान में चला गया तब से मुलाकातें कम हो गईं । अमेरिका जाने से पहले आभास कितने लोगों से मिल आया था, उनमें एक देवयानी भी थी । अचरज की बात थी कि यहाँ रहते जिसका ध्यान शायद ही आया हो, वह अमेरिका में रहते उसकी स्मृतियों में बसी हुई थी । सपना के साथ रोमांटिक क्षणों में भी उसे सहसा देवयानी का ध्यान हो आता । अचानक उसका अमेरिका जाना सुनकर कैसे उसकी आँखों में मोटे-मोटे आँसू छलक आए थे !
पहली बार देवयानी के घर का दरवाजा खटखटाते हुए उसका दिल धड़क  रहा था । मासी ने दरवाजा खोला तो उसे देखकर बहुत खुश हुईं - ‘‘क्यों रे, तू यहाँ कैसे? तू तो अमेरिका गया था न ? देवयानी, देख तो कौन आया है!’’ मासी उसका हाथ पकड़कर अंदर ले आईं और साथ ही सोफे पर बैठ गई ।
‘‘क्यों रे, तू बोलता क्यों नहीं? बांग्ला भूल गया क्या रे ?’’
‘‘आप भी मासी !’’
‘‘बोल तू कैसा है ?’’
‘‘अच्छा-भला हूँ, खूब सालन खाया है वहाँ । देखती नहीं इतना मोटा हो गया हूँ ?’’
‘‘छिः, मोटा कहाँ, तू तो पहले से भी सूख गया है आभास !’’
‘‘अच्छा, बताइए मासी, अभिजीत कहाँ है ?’’
‘‘अभिजीत सिलीगुड़ी में है आजकल । देख न, उसके यहाँ नहीं होने से कितनी दिक्कत होती है । हम दोनों माँ-बेटी अकेली रह गईं । जमाना इतना खराब है, इधर तो रोज बम-गोली चलता रहता है ।’’
आभास की निगाहें देवयानी को खोज रही थीं । वह अपने को सहज नहीं महसूस कर रहा था, फिर भी उसने मासी को इसका भान नहीं होने दिया ।
देवयानी चाय लेकर ही आई ।
‘‘तुम कब आए ?’’ वह उसकी ओर देखकर मुस्कराई ।
‘‘एक हफ्ता  हुआ !’’
‘‘वापस कब जाना है ?’’
‘‘अभी तय नहीं है ...’’
‘‘ओह, मैंने समझा, तुम फिर विदाई-भेंट में ही आए हो ।’’
‘‘मतलब ?’’
‘‘मतलब कुछ नहीं, कैसे हो ?’’
‘‘ठीक हूँ, तुम कैसी हो ?’’
‘‘अमेरिका में जाकर बहुत फाॅर्मल हो गए हो ?’’
‘‘क्यों, मैंने ऐसा क्या किया ?’’
‘‘नहीं, देख रही हूँ ..., तुम बातचीत में बहुत सॉफ्ट  हो गए हो ! और बताओ, कैसा लग रहा है अमेरिका में ? ट्विन टावर दुर्घटना की खबर मिलते ही मैंने तुम्हारे घर फोन किया था । बाद में पता चला कि तुम टूर पर
   थे । ..’’
‘‘जानती हो देवयानी, हादसे के दूसरे ही दिन मैं बोस्टन में एक तरह से लॉक-अप में था - पूरे दस घंटे ।’’ आभास ने फीकी हँसी के साथ कहा ।
‘‘ओ माँ, सच ? तुम्हें किसलिए पकड़ा था ?’’
‘‘शक, शक में पकड़ा था । मैंने तो समझा कि मैं गया, अब कभी अपनी धरती नहीं देख सकूँगा । ... तुम किसी से कहना नहीं, बेकार बात का बतंगड़ हो जाएगा । मैंने सिर्फ माँ-बाबा को ही बताया है ।’’
‘‘तुमने यह कहकर तो मुझे चिंता में डाल दिया आभास ! क्या पड़ी थी तुम्हें अमेरिका जाने की ?’’
‘‘अमेरिका जाना, वहाँ पैसे कमाना एक बड़ी उपलब्धि  देवयानी !’’
‘‘और इज्जत और जान गँवाना भी तो उपलब्धि ही  है, है न ?’’
‘‘दुनिया बदल रही है देवयानी, सब कुछ लोकल से ग्लोबल हो रहा है । अपने वतन, अपनी मिट्टी की महक का आग्रह ढीला पड़ रहा है । जहाँ पैसा है वहाँ सभी जाना चाहते हैं, आखिर बताओ पैसे का कोई विकल्प है
 क्या ?’’
‘‘तुम कितने सयाने हो गए आभास, कितनी दूर चले गए । सोच, कल्पना और चाहत की परिधि के  भी
 बाहर !’’ रूआँसी हो आई देवयानी ।
कभी-कभी मुँह से उल्टी ही बात निकलती जाती है । आभास को क्या कहना था, क्या कहता जा रहा था -
‘‘किस दूरी की बात कर रही हो देवयानी ? दुनिया में अब कुछ भी पहुँच के बाहर नहीं, पास में बस पैसा होना चाहिए !’’
‘‘है, बहुत कुछ है अब भी जो तुम्हारी पहुँच के बाहर है, भले ही तुमने जितने डालर भी कमा लिए हों...’’
‘‘जैसे ?’’
‘‘जैसे ? मैं जानती हूँ तुम मुझे नहीं चाहते, लेकिन तब भी बोलो मैं क्या मोल देकर तुम्हें पा लूँ आभास ? ... अमेरिका क्या गए दुनिया भर की दुकानदारी सीख आए !’’ देवयानी कुपित हुई तब आभास को लगा कि बातचीत गलत दिशा में चली गई है।
उसने मन ही मन सोचा - देवयानी कितनी भोली है, कितनी अनजान । वैश्विक स्तर पर चल रहे षड्यंत्रों, घातों-प्रतिघातों से बेखबर ! न उसे इस तेल-सभ्यता की जरूरतों का पता है, न नए बाजारों की तलाश की मजबूरी का। वह सिर्फ परिणामों को देखती है, कारणों में नहीं जाना चाहती । सोचती है, प्रेम के आगे सारे तर्क निरस्त हो जाने वाले हैं, सारी दुनियावी  बुद्धि परास्त हो जाने वाली है । अपनी धरती, अपने लोग, अपना
प्यार ! इसे नहीं मालूम इस वृत्ति को अब घर-परिवार का मोह करने वाले घरउफ मूर्खों का मानस करार दिया जा चुका है । इसे नहीं मालूम कि सपना की तरह भी प्रेम किया जा सकता है µ जिसमें सबकुछ नपा-तुला है, क्योंकि उसमें बुद्धि  है, देह है, तब कहीं मन है या आत्मा !
‘‘तुम रो क्यों रही हो देवयानी ? ... मुझे नहीं आना चाहिए था न ? तुम्हें व्यर्थ में दुःखी कर दिया । लेकिन यह तो बताओ कि खीर बनाना तुमने बिल्कुल छोड़ दिया क्या ?’’ आभास देवयानी को देख स्वयं विचलित था लेकिन संदर्भ बदलने के लिए जब उसने यह कहा तो दुपट्टे से आँख पोंछती हुई वह किचेन में गई और खीर का कटोरा लिए चली आई ।
‘‘अरे, रेडीमेड ? वाह !’’ आभास ने कटोरा हाथ में लिया ।
‘‘देवयानी, एक राय दोगी मुझे ?’’ अकस्मात आभास ने पूछा ।
‘‘क्या राय ? मैं कहाँ इस लायक ?’’
‘‘माँ-बाबा मेरे साथ वहाँ अमेरिका में रहना चाहते हैं । पूरी तैयारी कर रखी है उन्होंने ।’’
‘‘फिर? यह तो ठीक ही है । तुम उनकी इकलौती संतान हो ।’’
‘‘लेकिन मैं वापस वहाँ नहीं जाना चाहता । अमेरिका में रहना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता । बताओ मैं क्या करूँ !’’
‘‘क्यों, तुम्हें पैसा नहीं चाहिए क्या ?’’ देवयानी को बहुत अचंभा हुआ ।
‘‘पैसा तो चाहिए देवयानी ! सोचा था दो-चार साल उधर  काट कर आ जाउफँगा । बसने का ख्याल तो पहले भी नहीं आया था। सच पूछो तो बाबा का ही ज्यादा जोर था । और अब तो वे वहाँ जाने को तैयार बैठे हैं ।’’
‘‘सब जब अपना फायदा देख रहे हैं तो तुम बेकार की सोच में पड़े हुए हो । यह इमोशनल होने का समय नहीं है, काम करने का समय है । मौसा ठीक ही तो सोच रहे हैं । वे दोनों वहाँ रहेंगे तो तुम्हें घर की याद नहीं सताएगी और तुम मन लगाकर काम करोगे ।’’
‘‘तुम भी नहीं चाहती कि मैं यहाँ रहूँ । ठीक है देवयानी, अब चलता हूँ । ... मासी तो एकदम से गायब ही हो
 गईं । उन्हें प्रणाम कहना ।’’
आभास का मन बुझ गया था । वह महसूस कर रहा था जैसे सब कुछ उसके प्रतिकूल होता चला जा रहा है ।
‘‘नाराज हो गए ? बाबा, जो मन में आए करो । मैंने तो तुम्हारे माता-पिता का ख्याल करके ऐसा कहा, वरना मैं क्या तुम्हें जाने को ..., अगली बार जब आओगे तब शायद मैं बहुत दूर जा चुकी होऊँगी, फिर तुम कितना भी डाॅलर खर्च करके मुझे नहीं पा सकोगे आभास, अगर चाहो भी तो ... !’’

आभास वहाँ और न बैठ सका। घर लौटकर उसने माँ को कहा - ‘‘मैं देवयानी के घर गया था ।’’ माँ ने सहज भाव से पूछा - ‘‘अच्छा किया, मिताली कैसी है? इधर  उससे भेंट नहीं हुई ।’’ आभास ने बात आगे बढ़ाई - ‘‘मासी अच्छी हैं, देवयानी भी ठीक है । मैं वहाँ खीर खा आया हूँ, अरसे बाद ।’’ माँ मुस्कराती रहीं। आभास ने बात जारी रखी - ‘‘देवयानी खीर बहुत अच्छा पकाती है माँ ! माँ, तुम देवयानी के बारे में क्या सोचती हो ?’’ माँ ने बेटे को गौर से देखा, फिर कहा ... ‘‘अच्छी तो है, बिना बाप की बेटी हो गई। मिताली तो बिचारी उसकी शादी भी नहीं ठीक कर पा रही है। अभिजीत अपने ही कामों में व्यस्त रहता है। क्यों, तू इतना क्यों सोचता है ?’’ आभास ने जवाब न देकर सवाल ही पूछा - ‘‘तुम मासी की सहायता क्यों नहीं कर देती ?’’ माँ ने जुगुप्सा में बेटे को देखा - ‘‘वह कैसे ?’’ आभास कुछ चबा रहा था, मुस्करा कर रहा - ‘‘मैं, तुम्हारा बेटा देवयानी के लिए कुछ बुरा तो नहीं माँ ?’’ माँ के विस्मय में कुछ रोष भी जरूर था - ‘‘क्या बकवास करता है ? वह रिश्ते में तेरी बहन लगती है ।’’
‘‘ऐसे रिश्तों में शादियों तो होती ही रहती हैं माँ, कोई सीध रिश्ता तो है नहीं उनसे ?’’
‘‘नहीं आभास, मैं इस बारे में कोई बात करना नहीं चाहती ।’’
‘‘तुम्हें दहेज चाहिए माँ ?’’
‘‘मैंने कहा न, मुझे कुछ नहीं सुनना !’’
‘‘मान लो अगर मैंने देवयानी से विवाह कर ही लिया तो ?’’
‘‘तो कभी तुम्हारा मुँह नहीं देखूँगी ।’’
माँ आभास को ‘हार्डनट’ मालूम हुईं, तोड़ना मुश्किल मालूम हुआ ।
इस बीच पिता ने अपने मित्रों-रिश्तेदारों में अपने अमेरिका प्रस्थान की खूब ही चर्चा कर दी थी । फर्नीचर से लेकर मकान तक के खरीदार दरवाजा खटखटाने लगे थे । किसी को फ्रिज चाहिए था, किसी को वाशिंग मशीन, तो किसी को गीजर । एक शाम कुछ अजीब बात हुई । पिता फोन पर बात कर रहे थे कि आभास वहाँ पहुँचा । पिता नर्वस मालूम पड़ रहे थे । चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं । माथे पर बार-बार पसीना पोंछ लेते थे । फोन रखकर उन्होंने आभास को देखा और वहीं सोफे  पर बैठ गए । आभास पास गया ।
‘‘क्या बात है ?’’
‘‘ ................. ’’
‘‘क्या हुआ ?’’
‘‘वह तो मकान लिखने को कह रहा है - जबरन !’’
‘‘कौन ? कौन कह रहा है ?’’
‘‘कौड़ी के भाव लिखने को कहता है आभास । धमकी दे रहा है, तुम अभी घर के बाहर नहीं निकलना ।’’
‘‘साफ बात तो बताइए बाबा । बोलिए, क्या बात है ?’’
‘‘नाम नहीं बताया, कहा फिर फोन करेगा । ... इस शहर में तो बंगालियों का जीना मुश्किल हो गया है । अभी पिछले महीने ही राखाल बनर्जी आखिर शहर छोड़कर चले गए । लाखों की जमीन, उतना बड़ा मकान ! अब हमारे ऊपर आफत । क्या करें अब ?’’
‘‘सब आपके कारण हो रहा है ! बेटा अमेरिका क्या गया, लगे शहर भर में ऐलान करने कि वहीं जाकर रहेंगे । लाख मना किया कि जमाना खराब है, दस पैसे की औकात है तो पाँच पैसे की बताओ ...’’ आभास की माँ पति को पफटकार लगा रही थीं ।
बसु परिवार के समक्ष एक तरह से अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ । बचाव का एक ही रास्ता सापफ-सापफ दिखाई दे रहा था - अमेरिका । बाकी विकल्प धुँधले  थे, वे जोखिम लेना नहीं चाहते थे ।

और अब जरा साँस ले लें । यह शायद फरवरी या मार्च 2002 की बात होगी जब 9/11 के बाद पहली बार परितोष अमेरिका से स्वदेश आया था । उसने आभास के बारे में जो कुछ बताया, मैंने उसे ऊपर अपने हिसाब से प्रस्तुत कर दिया । उन दिनों सीमा पर भारी तनाव था । कभी भी लड़ाई छिड़ सकती थी । देश के अंदर भी माहौल बहुत खराब था । गोधरा  और उसके बाद की इकतरफा कार्रवाईयों ने नृशंसता और बेरहमी की सारी हदें तोड़ दी थीं । रोंगटे खड़े कर देने वाले प्रसंग मीडिया में देखने-सुनने को मिलते । सोचकर  मूर्छा आती थी कि अगर एक साथ संसार के सभी धर्म  संकटग्रस्त हो जाएँ तो क्या हो ! कुछ दिन रहकर परितोष अमेरिका वापस चला गया । वैसे शादी उसकी तबतक खटाई में थी । उसके पुराने मकान का जीर्णोद्धार पहले ही शुरू हो चुका था, हम ये समझते रहे थे कि इस बार परितोष दुल्हन लेकर ही जाएगा । लेकिन ऐसी कोई बात नहीं हुई । परितोष अकेला गया और खुशी-खुशी गया । वह वहाँ के सुथरेपन और व्यावसायिकता का कायल हो गया था, साथ ही वहाँ के सार्वजनिक जीवन में सत्यनिष्ठा और उच्च नैतिक मानदंड का भी उस पर गहरा प्रभाव था । एक बार हमलोग जब चटखारे लेकर मोनिका लेविंस्की और बिल क्लिंटन के गहन संबंधें पर बात कर रहे थे, परितोष की प्रतिक्रिया कुछ इस प्रकार थी -" अपने को हम चाहे जितना महान और ऊँचा समझते हों, बताइए जरा, बिल जैसा साहस हमारे यहाँ कितने राजनीतिकों में है, और ऐसी कितनी एजेन्सियाँ हैं जो राष्ट्र के सर्वेसर्वा को सच बोलने को मजबूर कर दें ? और इतना होने के बाद देश उसको माफ भी कर दे - ऐसा यहाँ, हमारे यहाँ संभव है ? दूसरों के लिए वे बेशक बुरे हो सकते हैं लेकिन स्वयं अपने लिए उनकी कसौटियाँ अलग हैं, लोकतांत्रिक मर्यादाओं की उन्हें समझ है और उसके प्रति वास्तव में उनमें कटिबद्धता है। दरअसल उनकी ताकत का एक आधर यह भी है जिसकी ओर हमारा ध्यान नहीं जाता !"
‘‘लगता है तुमने वहाँ बसने का इरादा कर लिया है, क्यों ?" मैंने हँसकर पूछा तो उसने कहा - "नहीं भइया, वह बात नहीं है । सच पूछिए तो वह बसने के लिए ऐसी बुरी जगह भी नहीं है, लेकिन मै दूसरी बात कर रहा हूँ । आपको जिनके साथ रहना है उनके अवगुण गिनते नहीं रह सकते । तो मैं कुछ उनकी खूबियाँ भी परखता रहता हूँ । आखिर उनमें कुछ बात है जो वे आज पूरी दुनिया पर छाए हुए हैं । चाहे वह रूस हो, भारत हो या चीन, कोई अमेरिका को नजरअंदाज नहीं कर सकता । नीतियों, विचारधराओं के ऊपर जाकर उससे तालमेल बैठाना ही पड़ता है । इसीलिए आज यह एकध्रुवीय  दुनिया की बात होती है । और हाँ, आपने जो बसने की बात कही तो वह इतना आसान भी नहीं है । रह-रहकर वे अपने दरवाजे हमारे लिए बंद कर देते हैं । इसलिए फिलहाल मैं बहुत ऊँचा नहीं सोच रहा शरत भइया ।"

मेरी पोस्टिंग शहर से बीस मील दूर एक ग्रामीण शाखा में कर दी गई । सड़क की बदतर हालत के कारण ट्रेन पर अप-डाउन करना पड़ता था, और ट्रेन की वह हालत कि पूछो मत । हर आधे मील पर सवारियाँ चढ़ती-उतरती थीं । उफपर से वह इलाका थोड़ा उग्रवाद प्रभावित भी था । मेरा तो सारा पानी उतर गया । शहर में बड़े मजे किए थे, अब उसका खूूब हिसाब चुका रहा था । घर के कामों का पूरा बोझ श्रद्धा  के ऊपर आ गया । देखते-देखते साल निकल गया । छोटे विवरणों में नहीं जाउफँगा । छुट्टी का दिन था, मैं शायद टीवी पर कोई मैच देख रहा था तभी परितोष का बड़ा भाई जिसके परचून की दुकान थी, शादी का कार्ड लिए आया ।
कार्ड अंग्रेजी में था । पूछने पर पता चला कि परितोष ने खाँटी देशी लड़की को प्राथमिकता दी थी । इसके कई कारण थे लेकिन मोटे तौर पर इसके दो लाभ थे - पहला कि देसी लड़की से विवाह करने पर वैवाहिक जीवन में आमतौर पर अनिश्चय का सामना नहीं करना पड़ता, और दूसर कि इससे अनायास दहेज की मोटी रकम उपलब्ध् हो जाती थी । परितोष व्यावहारिक लड़का था । कम-से-कम उसने अबतक साबित यही किया था । खैर! परितोष शादी के एक दिन पहले पटना आया । ऐन शादी के दिन ही सुबह-सुबह घर चला आया कि सपरिवार बारात चलना है । बारात क्या, वह तो गाड़ी में बैठकर बस एक पंच सितारा होटल में पहुँचना था जहाँ शादी की रस्में होनी थीं । खूब अच्छा इंतजाम था ।
शादी के चार-छह दिन बाद हमने वर-वधु  को रात के खाने पर आमंत्रित किया तो परितोष अकेला ही आया । पत्नी को कहीं और जाना था, ऐसा हमें बताया गया । हमारा मन थाड़ा छोटा तो हुआ क्योंकि श्रुति नई दुल्हन को लेकर खासी उत्साहित थी । परितोष ने उसे मनाया । फिर उसने हमारे साथ ही भोजन की तैयारी भी की । मेरे पास कभी किसी दोस्त की दी हुई रम की एक बोतल पड़ी थी । मैंने ऑफर किया तो थोड़ी झिझक के बाद वह तैयार हो गया । हम दोनों बाहर बरामदे में आ गए । हमने ज्यादातर अमेरिका के बारे में ही बातें की । भूगोल के प्रति मैं कभी बहुत गंभीर नहीं रहा था । मैं न्यूयार्क को यू० एस०  के पश्चिमी तट का शहर समझता आया था जबकि वह पूर्वी तट पर उत्तरी अटलांटिक महासागर के किनारे पर स्थित है । वाशिंगटन को मैं तटीय शहर मानता था, जो कि गलत साबित हुआ । राजधनी वांशिगटन डी.सी. है जबकि वाशिंगटन नाम का एक प्रांत भी है।  कैलिफोर्निया को मैं अब तक एक शहर मानता आया था, गलत । वह तो पश्चिमी तट पर एक प्रायद्वीपीय भू-भाग है, प्रांत है जिसका दक्षिणी सिरा मेक्सिको में है । बोस्टन जहाँ आभास को डिटेन किया गया था, न्युयाॅर्क से थोड़ी ही दूर पर उत्तर में स्थित है जबकि मै उसे दूसरे दक्षिणी छोर पर देखता आया था । मैंने यह भी जाना कि अमेरिका के पूर्वी तट पर पहुँचने के लिए भारत से वाया यूरोप जाना ठीक रहता है जबकि पश्चिमी तट पर वाया दक्षिण-पूर्व एशिया भी जा सकते हैं । अमेरिका में भी पब्लिक सेक्टर है, मुझे पहली बार परितोष ने ही बताया, और यह भी कि वहाँ राजनीति में महिलाओं की भागीदारी भारत की तुलना में बहुत कम है । भारतीय महिलाएँ अमरीकी महिलाओं की तुलना में कहीं ज्यादा सुरक्षित और हाँ, महत्वाकांक्षी भी हैं - यह परितोष का आकलन था जो मुझे कुछ सही नहीं लगा । अमेरिका इराक को सबक सिखाने पर आमादा है इसलिए कि इराक अमेरिकी डॉलर की बजाए यूरो में ट्रांजैक्शन करना चाहता है । अमेरिका की शक्ति डालर है, उस पर आघात करने वाला उसका प्रबल शुत्र है और उसका सफाया करना पहली प्राथमिकता । अमेरिका लोकतंत्र के नाम पर सैनिक तानाशाही को समर्थन दे सकता है, शांति के लिए युद्ध  थोप सकता है क्योंकि अमेरिकी नीतियों के पीछे कोई सैद्धांतिक मूल्य नहीं, बल्कि उसका अपना राष्ट्रीय हित है, उसकी अपनी आंतरिक और विश्वव्यापी जरूरतें हैं । अमेरिका एक साथ महाजन भी है और जमींदार भी । वह वादी, वकील और न्यायाधीश  की भूमिका में भी एक ही साथ दिखाई पड़ सकता है । अमेरिका दुनिया भर में करोड़ों लोगों के लिए सबसे सम्मोहक स्थान है तो उतने ही लोगों के लिए घृणास्पद प्रतीक भी ।
परितोष के साथ चर्चा में अमेरिका के बारे में मेरी जानकारी में खासा इजाफा हुआ । परितोष के बारे में मेरा आकलन भी कुछ बदल गया । वह एक गंभीर और जानकार आदमी की तरह बात कर रहा था, उस पर रम का कोई असर नहीं दिखाई दे रहा था । मैंने उसकी प्रशंसा में कहा - " वहाँ तो कहते हो कि बहुत व्यस्त रहते हो, फिर यह सब जानने-समझने का मौका कब मिला भाई ? "
यह कोई बड़ी बात नहीं है भइया । आखिर हम भी आँख-कान खुले रखते हैं, हाँ जुबान भले ही बंद रखते हों ! उस पर से यदि आभास बसु आपके साथ कमरा शेयर करते हों तो अनायास आपको बहुत सारी जानकारियाँ उपलब्ध् हो जाती हैं । ... ओह, मैंने तो आपको बताया ही नहीं ... ?"
"क्या  ? क्या नहीं बताया ?" मै जिज्ञासा में उसके कुछ पास सरक आया ।
"उसकी हालत ठीक नहीं !"
मेरे कुरेदने पर परितोष ने आभास के बारे में जो जानकारी दी, उसे उस बिंदु से जोड़ रहा हूँ जहाँ मैंने उसके बारे में बात करते-करते सहसा विराम लिया था, यानी जरा-सी साँस ली थी ।

उस धमकी के बाद आभास को घर के बाहर नहीं निकलने दिया गया । एक एजेंट के माध्यम उसके पिता ने उसके लिए टिकट का इंतजाम किया। वे चाहते थे कि सबसे पहले बेटा सुरक्षित निकल जाए । ऐसी ही हुआ, नहीं चाहते हुए भी आभास नौ-दस दिन के अंदर वापस सनफ्रांसिस्को  पहुँच गया । बहुत बुझे मन से उसने ज्वायनिग दी। उसकी लंबी अनुपस्थिति को पसंद नहीं किया गया । उसे कड़ी चेतावनी मिली । वह जिस साफ्टवेयर प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था, वहाँ से उसे हटा कर गैर-तकनीकी किस्म की जिम्मेवारी दी गई । वह आहत हुआ लेकिन कोई चारा नहीं था । उसने तय किया कि जल्द ही वह किसी और कंपनी के लिए कोशिश शुरू कर देगा ।
एक तो काम में कोई चुनौती नहीं, उस पर से घंटा भर अतिरिक्त ड्युटी बजाना । उसे दफ्तर  सबसे पहले पहुँचना और सबसे बाद में निकलना था । उसने परितोष से एक दिन कहा -
"यार , ऐसे तो मैं इंजीनियरिंग भूल जाऊँगा । ये लोग क्या कर रहे हैं मेरे साथ ?
"तुम भी तो वहाँ जाकर बैठ ही गए । भूल ही गए कि यह अमेरिका है, यहाँ यह सब नहीं चलता । अब जो कर रहे हें करने दो, तुम शिकायत का कोई मौका मत दो, बस जो कहते हैं करते चलो।" परितोष की संवेदना में झुँझलाहट थी लेकिन वह आभास से लगाव के कारण ही थी ।
"यह तो इंसल्टिंग है परितोष !"
"चिंता मत करो, थोडे़ दिनों में सब ठीक हो जाएगा ।’ परितोष ने उसे दिलासा दी !
आभास मित्रों-सहकर्मियों से कटा-कटा-सा रहने लगा । लेकिन जाने कैसे सपना को उसके लौटने की खबर मिल गई । वह उससे मिलने चली आई ।
मुझे लगता था तुम नहीं आओगे आभास । तुम्हें यहाँ फिर से देखना ... ओह, व्हाॅट अ प्लेजर !" सपना चहक रही थी लेकिन आभास औपचारिक बना हुआ था ।
"क्या  बात है आभास? परेशान दिखाई देते हो? सब ठीक तो है ?"
 "हाँ -हाँ सब ठीक है । ऐसी कोई बात नहीं ।’’ वह उससे कह न सका कि उसका बस चलता तो फिर कभी लौट कर नहीं आता ।
"तो फिर  इतने गिरे-गिरे-से क्यों हो हैण्डसम ? यह अमेरिका है, लाइपफ एनजाॅय करने के लिए इससे बेहतर दुनिया में दूसरी कोई जगह है ? " सपना ने उसे बाहों में भर लिया - " ओ माई गॉड, आए एम फॉण्ड    ऑफ योर टेन्डरनेस आभास, आइ जस्ट डाय फॉर इट । तुम्हें दोबारा यहाँ देखकर कैसा लग रहा है, मैं कैसे बताऊँ  । मुझे लगता था मैं तुम्हें खो चुकी ।"
आलिंगन उष्ण था, और प्रगाढ़ भी। आभास दुःखी था लेकिन उसे जैसे सहारा मिल गया । उसे जैसे इसी की अभीप्सा थी । सपना के उच्छ्वासों में कुछ पल को वह सब कुछ भूल गया ।
सप्ताहांतों में इसकी आवृत्ति बनने लगी। सपना स्वयं उससे मिलने चली आती । वह वाकई आभास को पसंद करती थी । आभास के सौष्टव व व्यक्तित्व में उसे एक किस्म की कोमलता महसूस होती थी, वैसी ही जैसा कि लाॅरेंस ने लेडी चैटरली के गेटकीपर प्रेमी के बारे में वर्णन किया है । सपना अभास के इसी गुण पर मरती थी । वह उसे अपने साथ लिए जाने कहाँ-कहाँ घूमती पिफरती । उधर  आभास के मानमर्दन की भरपाई होती रहती । काम पर जितना उपेक्षित और गैर-जरूरी महसूस करता, उतना ही सपना के लिए महत्वपूर्ण बनता जाता था । फिर, उसे भूलना था, देवयानी को भूलना था । देवयानी को भूलने का सपना से अच्छा बहाना क्या हो सकता था - जागी आँखों से देखा गया सपना - क्रेजी सैपी !
कोई तीन महीने बाद पिता से  फोन पर बात हुई । उनका वीजा-पासपोर्ट तैयार था । अपना मकान साजो-सामान सहित किसी और दबंग को किंचित बेहतर दाम पर बेच अब अपने एक करीबी रिश्तेदार के यहाँ उन्होंने आश्रय  ले रखा था । वे देश छोड़ने को तैयार बैठे थे, बस आभास के संकेत की प्रतीक्षा थी । सपना की मदद से आभास ने कुछ बड़ा मकान किराए पर ले लिया । एक उपनगरीय क्षेत्रा के सीमांत पर एक मलयाली परिवार का मकान ।
आखिरकार बसु परिवार अमेरिका में आ जमा । माँ-बाप दोनों अपार उत्साह में । पिता को यहाँ की हर चीज नायाब लगती । वे मुग्ध् और विभोर ! बाता-बात में भारत से तुलना करते। भारत उन्होंने पूरा देखा भी नहीं था, जितना देखा था, वहा था घटिया, पिछड़ा, वाहयात और इनकाॅरिजिबल - कभी नहीं सुधरने वाला ।
मकान पूरी तरह फर्निश्ड था । माँ भले ही बडे़ परिवार से आती थीं लेकिन उनके लिए यह नया आवास कल्पनातीत था। क्या सोफा, क्या बिस्तर, क्या रसोई । सब कुछ हैरतअंगेज । सचमुच अगर औलाद लायक हो तो धरती  पर स्वर्ग उतर आता है ।
लेकिन सपना को लेकर माँ सशंकित रहतीं - न जाने किस कुलगोत्र की लड़की है । उसकी आभास के साथ उठ-बैठ कभी-कभी शिष्टता की सीमा लाँघती प्रतीत होती, लेकिन मन मारकर खुद को समझाने का प्रयास करतीं - यह अमेरिका है । कभी-कभी उनको लगता कि देवयानी को लेकर उनकी नाराजगी के विरुद्ध आभास का यह प्रतिक्रियात्मक व्यवहार था, कि लो देवयानी को नहीं सह सकती तो सैपी को झेलो ।
लेकिन सपना को लेकर पिता निर्द्वन्द्व ही नहीं, बल्कि उत्साहित थे । सपना का साथ हासिल करना उनके लिए बेटे की एक और उपलब्धि की  तरह था । आखिर बेटे में कुछ खास बात जरूर है जो तीस सालों से अमेरिका में जमे करोड़पति ;शायद अरबपतिद्ध एन आर आई  की बेटी उस पर मरती है । बेटा अपने संपर्कों का विस्तार कर रहा है - यह उसके भविष्य के लिए अच्छा है । और भविष्य अब और कहाँ है ! अब तो वर्त्तमान भी यहीं, भविष्य भी यहीं । यहाँ पहुँचकर अब पीछे देखना मूर्खता है ।
मगर माता-पिता दोनों एक अनुभव में साझेदार थे - आभास के पास उनके लिए समय कम है । आभास सामान्य नहीं दिखाई देता, उसका हँसना-बोलना कम हो गया है । आभास अतिशय व्यस्त है । आभास कभी-कभी अपरिचित-सा हो आता है ।

उन दिनों एशियाई, खासकर भारतीय तकनीशियनों के प्रति अमेरिकी प्रशासन सख्त हो गया था । उन्हें अमेरिकी कंपनियों में प्रवेश नहीं मिल रहा था, यहाँ तक कि उनके वीजा कैंसिल किए जा रहे थे । स्थानीय युवाओं में बेरोजगारी बढ़ने को इसका कारण बताया जा रहा था । कई लोग इसे अमेरिकी विदेश नीति की जरूरतों से जोड़कर देखते थे। यह कोई नई बात नहीं थी लेकिन आभास और परितोष जैसों पर इसका दबाव जरूर था। उन्हें लगता कि किसी भी समय उनसे वापस लौटने को कहा जा सकता है । इसी बीच कंपनी के अधिकारी के साथ आभास की गरमागरम बहस हो गई । दरअसल आभास के सब्र का बाँध् तब टूट गया जब संप्रेषण की एक छोटी-सी गलती को लेकर उसे डाँट पिलाई गई । नहीं चाहते हुए भी आभास बोल गया -" मुझसे गलती हुई है लेकिन यह अस्वाभाविक नहीं है, क्योंकि मुझसे वह करने को कहा जाता है जो मेरा काम है ही नहीं ।" यह सुनते ही प्रोजेक्ट डायरेक्टर साहब भड़क गए । कहने लगे -‘‘कम्पनी जिसको जिस योग्य समझती है, वैसी जिम्मेवारी देती है। तुम्हें इसी काम में अपनी उपयोगिता सिद्ध  करनी है, यह तुम्हें करना होगा ।"
आभास भी बिगड़ गया - ‘‘तब कहना होगा कि योग्यता मापने का आपका पैमाना सही नहीं है ..."
 "तुम्हें बहुत जल्दी पता लग जाएगा कि योग्यता मापने का हमारा पैमाना वास्तव में क्या है, अब जा सकते हो।" साहब ने कहा तो आभास तमतमाया हुआ उनके केबिन से बाहर निकल आया ।
आभास के मित्र व सहकर्मी परितोष के यहाँ इकट्ठे हुए । आभास को निकाला जाना तय मान रहे थे । उन्हें यों अपने लिए भी आशंका थी । परितोष का मानना था कि आभास को इतना एक्सप्रेसिव नहीं होना चाहिए था, अपनी स्थिति कमजोर हो तो दो बात सह लेने में ही बुद्धिमानी है । वे सब आभास का इंतजार करते रहे, वह नहीं आया। परितोष ने उसे फोन किया तो उसका मोबाइल ऑफ पाया । उसने अनुमान लगाया कि आभास आने को कहकर भी शायद इसलिए नहीं आया कि दफ्तर में हुए तनाव के बाद फिर उससे सवाल-जवाब किया जाएगा । रात को उसने फिर आभास से संपर्क साधने  की कोशिश की, लेकिन व्यर्थ ।
आभास देर रात को घर लौटा । बोस्टन वाली घटना के बाद पहली बार वह इतनी देर बाहर रहा। सनफ्रांसिस्को  की रात का नजारा करते हुए वह सोचता रहा ..." मैं यहाँ क्यों हूँ, किसलिए ? मुझे यहाँ क्यों होना चाहिए ? मुझे जीवन से क्या चाहिए ? मैं किसके लिए क्या कर रहा हूँ ? मैं यहाँ क्या आजीविका के लिए हूँ ? मैं यहाँ सिर्फ पैसे के लिए हूँ - किसी भी कीमत पर कमाया गया पैसा ? पैसे की मुझे क्या दरकार, खाते-पीते परिवार के अकेले वारिस को कितना कुछ चाहिए अपने सभ्य-सुसंस्कृत अस्तित्व के लिए ? मैं देवयानी के लिए यह देश न छोड़ सका, क्या मैं सपना के लिए अपना देश छोड़ दूँ ?"
माता-पिता खासे चिंतित थे क्योंकि परितोष और सपना के फोन भी कई बार आ चुके थे अब तक । आभास ने हाथ-मुँह धेया और सीधे  खाने की मेज पर आ गया । पिता उससे अंग्रेजी में कुछ-कुछ पूछते रहे । वह अचानक चिढ़कर बोला  -"आप यहाँ आकर बांग्ला भूल गए क्या ? जब देखो तब अंग्रजी ही बोलते रहते हैं ?" पिता उसकी बात सुन सकते में आ गए, लेकिन उस वक्त उसे छेड़ना उचित नहीं समझा । पत्नी ने भी उन्हें चुप रहने का इशारा किया । लेकिन आभास ने जैसे सुर पकड़ ली -" अपनी भाषा, अपने देश, अपनी पहचान के प्रति आपमें इतना तिरस्कार का भाव क्यों है ? लोग बेदखल कर दिए जाते हैं, अगवा कर लिए जाते हैं, मार भी दिए जाते हैं - क्या उन सबको इसीलिए अपनी जमीन छोड़ देनी चाहिए ? आपकी योजना मैं खूब समझता हूँ, आप मुझे अमेरिकन बनाने पर अमादा हैं, लेकिन आपको क्या मिल जाएगा इससे ? अपनी हीनताग्रंथि आप मुझ पर क्यों लादना चाहते हैं । सोचिए, सौ साल पहले बंगाल से चलकर विवेकानंद यहाँ क्या करने आए थे । आज हम क्या करने आए हैं यहाँ ? हम अपनी मेधा  देते हैं उनको, अपना श्रम देते हैं । हमसे ताकत पाकर वे पूरी दुनिया पर राज करते हैं, हम क्यों हों नत-मस्तक उनके सामने ? वे हमपर अहसान नहीं करते, हम पर कुछ डालर फेंककर ? ..."
बसु परिवार ने वह रात आँखों में काटी । तीसरे दिन ही आभास को काम से हटा दिया गया । यह अप्रत्याशित नहीं था, अप्रत्याशित था सेवाच्युति संबंधी  वह पत्र जिसमें कारोबर में मंदी और कंपनी की माली हालत सही नहीं होने को आभास की विमुक्ति का कारण बताया गया था । अमेरिकी फूँक-फूँक कर कदम रखते हैं और अपने देश के कानून की परवाह करते हैं ! एक जूनियर स्टाफ को भी टर्मिनेट किया गया । ताकि कार्रवाई व्यक्ति-केन्द्रित न दिखे ।
वीजा की अवधि समाप्त होने में अभी दो माह शेष थे। आभास को निर्णय लेना था और तेजी से काम करना था । अगर वहाँ रहना था तो इसके लिए वीजा के नवीकरण का प्रयास शुरू कर देना था, यदि नहीं तो उसके पहले भारत लौटने की तैयारी करनी थी । लेकिन भारत लौटकर वह जाएगा कहाँ ? घर-बार तो सब पिता बेच आए । एकदम नए सिरे से शुरूआत करनी होगी, वह भी अपनी ही जमीन पर। क्या विडंबना है ! आभास लगातार सोच में था - क्या करना चाहिए ? न्यूजर्सी में अपने एक दोस्त को उसने फोन किया -" मेरे लिए कोई जगह देखो, आय एम आउट आॅफ जाॅब राइट नाउ !" "देखता हूँ, लेकिन मुश्किल लग रहा है ..."उधर  से जवाब मिला । फिर उसने सपना को फोन मिलाया - ‘‘हैलो सैपी, आइ एम नाउ फ्री  टू बी विद यू । आर यू टू? "
"व्हाट  डु यू मीन ? आर यू काॅलिंग फ्रॉम  योर ऑफिस ?"
"नो, सॉरी सैपी, आय एम ऐन आउस्टेड फेलो फाॅम येस्टर्डे ।"
"ओह नो ... ! सी मी ऐट सिक्सोक्लाॅक, यू मस्ट !"
"ओके ... !" लेकिन उस शाम वह सपना से मिल न सका ।
आभास ने मात-पिता को अब तक नौकरी से निकाले जाने की खबर नहीं दी थी । उन्हें सदमा पहुँच सकता
था । आखिर वे उसके भरोसे सब कुछ पीछे छोड़ आए थे । उसने माँ से बात करनी चाही ।
"कैसा लग रहा है यहाँ माँ ?"
"अच्छा ही लगता है, बस मुँह बंद रखना पड़ता है । तुम व्यस्त रहते हो, तुम्हारे बाबा दिन-रात टीवी से ही चिपके रहते हैं । और तो यहाँ कोई है नहीं जिससे बात करूँ। तुम्हारी वह सैपी तो कोई रोज-रोज आती नहीं। वैसे भी उसकी बातें मुझे समझ में कम ही आती हैं।"
"सॉरी माँ, मैं तुम लोगों का बहुत ख्याल नहीं रख पाता !" आभास को कुछ ग्लानि-बोध् हुआ ।
"अच्छा जाने दो, ऐसी कोई बात नहीं ! आखिर तो यहाँ काम ही करने आए हो ! लेकिन सुनो, जरा अपने बाबा का यहाँ चेकप करा दो। उन्हें छह महीने पहले हल्का स्ट्रोक लगा था । तुम घबरा कर चले आओगे, इसलिए तुम्हें बताया नहीं ।"
"क्या  ? यह तो ठीक नहीं है, तुम्हें यह बात छुपानी नहीं चाहिए थी ..."आभास चिंता में पड़ा ।
"इतना हंगामा करके यहाँ आए, मैंने इसीलिए इन्हें रोका नहीं कि वे टेंशन में रहेंगे । वहाँ भी तो कितनी घुटन है, अपनी ही जगह पराई लगती है । मुझे भी इस तरह यहाँ आना बिल्कुल अच्छा  नहीं लगा । और ... उनको तुमसे बहुत हौसला है आभास, इसका ख्याल रखना !" माँ की आँखें भर आईं। वह माँ की ओर और देख न
सका । पकड़े जाने पर अपराधी  का कलेजा ऐसे ही धड़कता होगा शायद ।
अब क्या करोगे आभास बसु ? यू इमोशनल नाॅस्टैल्जिक फूल ! अब अगर लायक हिन्दुस्तानी बेटे का कर्त्तव्य निभाना है तो देखना होगा कि बाप को कोई चोट न पहुँचे । कैसे कह सकोगे माँ-बाप से कि नाकाम होकर तुम स्वदेश लौटने की तैयारी कर रहे हो ? पिता को कुछ हो गया तो माँ को अपना मुँह कैसे दिख पाओगे ? तुम फँस गए । हाँ, फँस गए ! तुम्हें फिलहाल यहीं रहना है, किसी भी तरह यहीं रहना है । तुम नौकरी से निकाले जा सकते हो, लेकिन तुम माँ-बाप को अपनी जिंदगी से नहीं निकाल सकते ।
आभास ने अपनी आँखों की कोरों को साफ किया । पहली बार, जीवन में सर्वथा पहली बार, उसे महसूस हुआ जैसे वह एक विस्थापित व्यक्ति हो, जैसे वह ऐसा पौधा  हो जिसे एक जगह से उखाड़कर दूसरी जगह लगाने का जतन हो रहा हो । और इसमें जाने कौन-सी शिराएँ चटखती जा रही हैं, कौन से रेशे अंतर के टूटते जा रहे हैं !
उधर  जब आभास सपना से मिलने नहीं गया तो दूसरे दिन वह सीधे  उसके दफ्तर पहुँच गई । वहाँ उसे आभास के बारे में जानकारी मिली । उसने आभास को फोन पर खुब खरी-खोटी सुनाई । आभास चुपचाप सब सुनता रहा जैसे उसने अपनी गलती मान ली हो। वह जानता था कि उसे इस संकटपूर्ण स्थिति से कोई बाहर निकाल सकता था तो वह सपना ही थी । वह फौरन उससे मिलने निकल पड़ा ।
" बोलो सपना, मैं अब क्या करूँ !य् आभास को अपने बारे में विस्तार से बात करनी पड़ी । उसे सपना को वह सब कुछ बताना पड़ा जो वह उसे कतई बताना नहीं चाहता था । वैसे भी अपना दुखड़ा रोने को कोई शिष्ट व्यवहार नहीं मानता । सपना ने ध्यान से उसकी बातें सुनीं । ढाढ़स बँधाया और अपने पिता के संपर्कों का हवाला दिया ।
रात को आभास अन्यमनस्क-सा टीवी के सामने बैठा चैनल्स बदल रहा था । इराक में अमेरिका फौज ‘शैतान’ के शासन का अंत कर रही थी । वहाँ मनुष्यत्व और अच्छाई की पताका फहरानी थी । आतंक के विरुद्ध  आतंक का माहौल तारी हो रहा था और दुनिया ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ में उलझ रही थी । टीवी पर अमेरिका-इंग्लैण्ड की सरकारों के खिलाफ विश्वव्यापी विरोध प्रदर्शनों की भी खबरें आ रही थीं। आभास सोच रहा था -
" आम अमेरिकी राजनीति पर बात करने से कतराता क्यों है ? शायद विकास का एक स्तर प्राप्त कर लेने के बाद राजनीतिक जागरूकता या संवेदनशीलता की उतनी जरूरत नहीं रह जाती । तब तो बिल्कुल ही नहीं जबकि राजनीतिक फैसलों का सीधा  असर अपने देश, अपने लोगो पर नहीं होता हो । लेकिन अमरीकी अपने रक्त के प्रति अतिशय संवेदनशील हैं । उनका रक्त अगर कोरिया या वियतनाम में बहे, अफगानिस्तान में बहे या फिर न्युयार्क में ही, तो जनमानस उद्वेलित होता है, आंदोलित होता है और राजनीति पर इसका असर भी होता है । ट्विन टावर हमले में अपने परिजनों को खो चुके कई अमेरिकी नागरिकों के हाथों में तख्तियाँ थीं - "वी  वांट पीस !"
"सुनो आभास..." बाबा सामने आकर बैठे ।
"खुलना जिले के अपने गाँव से जब मार-मार कर हमें भगाया गया था तो मेरी उम्र पाँच साल थी । हमारा बहुत खुशहाल संयुक्त परिवार था । सब गँवाकर हम तितर-बितर हो गए । बदहवासी में जब हम बार्डर पार करके इंडिया में आए तो परिवार आधा  रह गया । बाकी आधे  परिवार की तलाश सालों चलती रही । माँ किसी तरह अपने कुछ गहने बचाकर ला सकी थी । वही हमारे काम आया । दो साल तक हम कोलकाता में अपने रिश्तेदारों के यहाँ मारे-मारे फिरते रहे कि संयोग से बाबा को रेलवे में नौकरी मिल गई । हम खुलना से चलकर कोलकाता आए थे, अब कोलकाता से मुगलसराय आ गए । फिर स्थान-स्थान पर बाबा की बदली होती रही । अंत में हम पटना में  आकर जमे । बाबा ने एक छोटा-सा मकान खरीदा और उसी में रेलवे की अपनी सारी कमाई लगा दी । हमारे दिन बहुरे, हमें अपनी जमीन मिल गई, उसी को अपना माना । न हमें कोलकाता की याद आई, न खुलना की । सब कुछ ठीक ही चला लेकिन अंत में फिर वही । हम बेदखल होने पर मजबूर हुए । हो सकता है मैं ज्यादा ही डर गया होउफँ, लेकिन यह हुआ । आभास, मुझे बहुत चोट पहुँची । मैं समझ नहीं पा रहा कि मैं किस मिट्टी से संबंध रखता हूँ - खुलना की मिट्टी, कोलकाता की मिट्टी या पटना की । मैं समझ नहीं पा रहा आभास कि मेरी कौन सी राष्ट्रीयता है ! तुम समझदार हो, इस ट्रेजेडी को समझ सकते हो ! तुम जब यहाँ अमेरिका आ गए तो मुझे लगा कि हमें अब राष्ट्रीयताओं के पार निकल आना चाहिए, कहीं जब कुछ अपना नहीं तो सब जग अपना हो जाता है आभास । यह ‘ब्रोकेन आइडेंटिटी’ है न आभास ? हमारी पहचान खंडित हो चुकी है, मूल्य-बोध् खंडित हो चुका है लेकिन इसका जिम्मेदार कौन है ? आभास, जरा सोचो ! लाख छुपाया लेकिन कोलकाता में रिफ्यूजी  ही कहलाए, अपनी बंगालियत को बचाए रखा हमने और बिहारी नहीं बन पाए । यह बिहारी होना, बंगाली होना, इंडियन होना - यह कैसे संभव हो पाता है, समझ में नहीं आता आभास। मैं जानता हूँ, हम शायद अमेरिकन भी नहीं बन पाएँगे !"
कुछ देर के लिए बाबा चुप हो गए। आवाज उनकी भारी थी । आँखों में उनकी आँसू थे ? पता नहीं । आभास ने उनकी ओर देखा नहीं, इंतजार करता रहा। वे फिर बोले -"मैंने गलत किया न आभास ? सोचा, जब दुनिया एक बाजार ही है तो क्यों न खुद को वहाँ बेचा जाए जहाँ मोल ज्यादा लगता हो, ज्यादा दाम मिलता हो ! उसके हाथों क्यों न बिका जाए जो सबसे बड़ा खरीदार हो । यही तो च्वाॅइस है अपने पास कि अपना खरीदार ढूँढ लें, बाकी तो कहीं कुछ हमारे वश में नहीं ! किसको दरकार है हमारी ? ... लेकिन तुम्हें मैंने अपना जरिया बना डाला आभास, यह मैंने अच्छा नहीं किया । मैं सचमुच शर्मिदा हूँ ... !"
सहसा आभास को ख्याल आया कि पिता को तनाव से बचना चाहिए ! वह क्या करे कि वे नार्मल हो जाएँ ? इस हाल मे अगर उन्हें यह मालूम हो कि उसकी नौकरी चली गई है तो जाने क्या हो ।
"ठीक तो है बाबा, हम अब पैन-सिटीजेनशिप - विश्व नागरिकता की ओर बढ़ चले हैं । ग्लोबलाइजेशन के पैरोकार इसी की तो वकालत कर रहे हैं । अच्छा है, इस मुहिम में हम आगे हैं । क्यों चिंता करते हैं ?"आभास ने मुस्कराकर कहा तो पिता ने उसे साश्चर्य देखा । अब आभास उनकी आँखों की नमी साफ-साफ लक्षित कर सकता था ।
"हमारी चाहे जो मजबूरी हो लेकिन देखिए, इंडियंस हर कहीं छाए हुए हैं कि नहीं ? विवेकानंद ने कहा था - भारत विश्वगुरु बनेगा । अब देखिए ! दुनिया भर में इंडियन कम्युनिटी का जिस तरह प्रसार हो रहा है, अब तो कई देशों में वे सत्ता में भी भागीदारी कर रहे हैं । यही हाल जारी रहा तो, और वह जारी रहेगा, तो भारत तो यों ही विश्वगुरु बन जाएगा ! बोलिए मैं गलत बोल रहा हूँ बाबा ? फिर ... आखिरकार हम इंडियन तो हैं ही ... बाबा ! हमारी यह पहचान तो अक्षुण्ण है, तब और भी जब हम अपने देश के बाहर हैं - सात समुंदर पार! "

उस रात की बातचीत के बाद पिता को तो चैन आया लेकिन आभास की बेचैनी तो बढ़ ही गई । उसे फौरन काम चाहिए था । दिन-दिन भर उसने कितने ही व्यक्तियों से संपर्क किया, घंटों इंटरनेट पर बैठा वैकेनसीज देखता रहा, इंटरनेट पर ही कुछ इंटरव्यू भी दिए लेकिन नतीजा कुछ नहीं । सपना के बार-बार के आग्रह पर आखिरकार वह उसके पिता से मिलने को राजी हुआ । उनसे घर पर मिलना ही सुविधजनक माना गया ।
इस इलाके में एशियाई लोगों का अच्छा संकेन्द्रण था । सपना का मकान वाकई एक खूबसूरत विला था - लता-गुल्मों के हरे आवरण से सज्जित । अंदर बैठा तो सपना ने अपने पिता से उसका परिचय कराया । वे सीधे  असली बात पर आ गए -" सैपी ने मुझे तुम्हारे बारे में बताया है। तुमने बचकानी हरकत क्यों की ? अच्छे-खासे जॉब में थे तुम ! यहाँ तो भई तुम्हें सेंट परसेंट प्रोफेशनल बनना हो, तभी टिक पाओगे, नहीं तो फिर क्या फायदा ! मैंने तो जहाँ कहीं भी पता किया, बाहर के लोगों को निकाल ही रहे हैं । थोड़ी रिसेशन चल रही है । गलत समय पर तुमने वहाँ पंगा लिया ।"
आभास चुपचाप उन्हें सुनता रहा । अच्छी हिंदी बोल रहे थे, सुनकर अच्छा लगा । सैपी मुस्कराती हुई आभास के चेहरे पर अपने पिता की बातों का असर पढ़ रही थी जैसे ।
"तुम बंगाली हो ? ... बंगाली लोग जरा जल्दी रिऐक्ट करते हैं, क्यों ?" वे मुस्कराए ।
"सर मैं बिहारी हूँ, कह सकते हैं बिहारी बंगाली !" आभास भी मुस्कराया । सपना थोड़ी टेन्स हुई ।
"ओह, आई सी । तब तो तुम सचमुच स्पेशल हो भई । तभी तो सैंपी तुम्हें इतना पसंद करती है । क्यों सैपी ? " वे हँसे, और सपना को देखा। सपना ने उनकी बाँह पकड़ ली ।
"आभास इज रिएली स्पेशल डैड, प्लीज डू सम्थिंग और हिम, दिस इज अर्जेंट डैड !'
"सर, मेरा वीजा ... अगले महीने ..."
"यह तो तुम्हें पहले सोचना चाहिए था न ?"
"पहले यहाँ रुकने की कोई मजबूरी नहीं थी, अब है, प्लीज हेल्प मी सर ।"
"देखो , फिर कोशिश करता हूँ । ऐसा करो, तुम दो दिन बाद मुझसे मिलो ! या फिर सैपी तो है ही, मैं खबर कर दूँगा ।"
"नहीं सर, मैं खुद हाजिर हो जाउफँगा ।" आभास कहते हुए उठ खड़ा हुआ और उनसे विदा ली ।
"डैडी अपीयर्स टु बी इम्प्रेस्ड, थैंक्स गाॅड, नाउ वी मे हैव सम होप !"

इस मुलाकात से काफी संतुष्ट थी सपना । सपना ने हाथ बढ़ाया तो आभास ने दोनों हाथों में वह हाथ लेकर उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट की ।
परितोष एक हफ्ते के प्लेजर ट्रिप पर निकलने वाला था । उसके पहले वह आभास से मिलना चाहता था । परितोष तो चाहता था कि किसी तरह आभास भी उसके साथ हो ले लेकिन वह जानता था कि वह शायद ही संभव हो पाए । वास्तव में परितोष आभास के कैरियर को लेकर खासा चिंतित था और अपने स्तर पर उसके लिए जगह भी तलाश रहा था । दोनों की भेंट जब हुई तो दोनों बहुत खुश हुए ।
"फिर, तुमने उस लड़की के पीछे हमें तो एकदम भुला ही दिया ।" परितोष ने उलाहना दी ।
"कौन जानता है, मैं खुद को भुला रहा होऊँ  परितोष !" यह सुनकर  परितोष के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। उसने आभास के कंधे  पर हाथ रखकर कहा -" सब ठीक हो जाएगा यार !"
"कभी-कभी सोचकर गिल्टी कांशस हो जाता हूँ कि मैं उसे कहीं यूज तो नहीं कर रहा हूँ ।"
"यहाँ यह सब चलता है प्यारे, इतना सोच-विचार में पड़ने की जरूरत नहीं ।" परितोष  उसे सांत्वना दी।
"कैनेडा चलते हो? चलो घूम आएँ, पैसे की चिंता नहीं करो ।"
"तुम हो आओ । मैं कैसे जा सकूँगा अभी । अभी तो ..."
"अच्छा ठीक है । सुनो, एक बात कहुँ, बुरा तो नहीं मानोगे ?"
"क्या  ?"
"एक बार यार माफी माँग लेते, शायद तुम्हें वापस बुला लें । आभास सोच में पड़ गया। उसे गुस्सा नहीं आया, जबकि परितोष उसकी चुप्पी से परेशान होने लगा था ।
"देखो, मैं तुम्हें हर्ट करना नहीं चाहता, लेकिन देख रहे हो कितनी क्राइसिस है ! कहो तो मैं एक बार उस उल्लू के पट्ठे से बात करूँ । उसका मन जानने की कोशिश करता हूँ।"
"ठीक है, देखता हूँ ।"
"देखना नहीं है, यह काम कर डालना है । तुम्हारे जैसे जीनियस का यह हाल देखा नहीं जाता आभास । बहुत हो चुका, अब जल्दी कुछ करो ।"
परितोष के प्रस्ताव को अंतिम विकल्प के तौर पर आजमाया जा सकता था । लेकिन उसे लगता था कि शायद इसकी जरूरत न पड़े । वैसे भी माफी मिल जाने की कोई गारंटी तो थी नहीं । तब भी उसने इस बात का जिक्र सपना से करना जरूरी समझा । लेकिन उसने शंका जाहिर की। कंपनी ने जिन परिस्थितियों का हवाला देकर आभास को बाहर किया था उसमें उसे फिर से वापस ले लेना संभव नहीं लग रहा था ।
दोबारा जब आभास सपना के पिता से मिला तो उन्होंने कहा -" देखो भई, यहाँ काम तो मिल रहा है - इलेक्ट्रिशियन का काम, प्लम्बर का काम, सुपरवाइजर का काम, वगैरह-वगैरह लेकिन इंजीनियर, वह भी कम्प्यूटर इंजीनियर के लिए कोई जगह नहीं, किसी आइ.टी. प्रोपफेशनल के लिए कोई जगह नहीं । फिलहाल तो नहीं ही है । बाद में पता नहीं क्या हो । यू नो, अभी ऐसी ही पॉलिसी चल रही है, इसमें कोई एम्प्लायर क्या कर पाएगा ? आये एम सौरी, आय कैनोट हेल्प इट !"
सपना ने आभास को देखा, फिर पिता से कहा -
"डैड , आभास की रीइम्प्लाॅयमेंट नहीं हो सकती उसी कंपनी में ? कम से कम फिलहाल तो यह क्राइसिस खत्म हो जाती, वीजा का रीन्युअल भी हो जाता । फिर बाद में देखते जो होता ? क्यों आभास ? " आभास ने सहमति में सिर हिलाया तो सपना के पिता ने हैरत से उसे देखा ।
"ठीक है, मैं पता करता हूँ । आय थिंक, नाउफ यू आर कमिंग टू दि टर्म्स  ! दैटीज बेटर ! गाॅड ब्लेस यू !" आभास को देखकर वे व्यंग्य में मुस्कराए । लेकिन वे रुके नहीं ।
"देखो, बुरा मत मानना, इट इज जस्ट बीइंग फूलिश  टु बी ईगोइस्टिक । जिन कई सारी चीजों को लेकर इंडिया में हम पूरी जिंदगी परेशान रहते हैं, उनकी यहाँ कोई वकत ही नहीं है । उनको अगर हम यहाँ फाॅलो करें तो उससे नुकसान ही है, और उसे पिछड़ा बर्ताव भी माना जाता है । खैर, धीर-धीरे  सब ठीक हो जाएगा । थोड़ा प्रैग्मेटिक अप्रोच रखो, और क्या !"
आभास ने उनकी बातें ध्यान से सुनीं और कहा -" मैं  कोशिश करुँगा सर !"

उस शाम आभास बहुत उदास था, बहुत अकेला । सैनप्रफांसिसको की सड़कों पर उसे वह बारह फीट चैड़ी गली याद आ रही थी जिसमें उसका मकान था । मालती के लत्तरों से लदा जिसका बारामदा था, जिसके फाटक पर एक ओर कनेर और दूसरी ओर कचनार लगा था । अभी वहाँ सुबह हुई होगी ! उजले रंग का वह दोमंजिला मकान सुनहली आभा से नहा उठा होगा । फाटक के पास नीचे जमीन पर कचनार और कनेर के फूल बिछे होंगे, भींगे-भींगे से । अंजुरी में उनकी कोमल, ठंडी छुअन कैसा तो जादू करती है, देह सिहर जाती है ! अंतर में खुशबुओं का मेला-सा लग आता है । ओह, कैसी गंध् ! इतनी दिव्य, इतनी अपनी ! अभी माँ की आवाज आएगी - "आभास, कहाँ है बेटे ? तेरा दूध् का गिलास तैयार है । आज बाबा के साथ घूमने नहीं जाएगा ?" अभी बाबा पुकारेंगे - "आभास, किधर  चलें आज, गवर्नमेंट हाउस की तरपफ, या एअरपोर्ट चलोगे ? " अभी-अभी बारह-तेरह साल की, बड़ी-बड़ी आँखों और लंबे बालों वाली एक लड़की बगल के ओसारे से उतर पूजा के फूल तोड़ने लगेगी और आभास को चिढ़ाती हुई कनेर की डालियों को भी नीचे झुकाएगी । खीझ आने पर भी आभास उसे कुछ न कह पाएगा । अभी-अभी गोपाल दा शंख बजाएँगे और सारा मुहल्ला जाग जाएगा ! ... पॉपी के टेस लाल फूल खिले हैं, मौसम के पहले फूल । काले गुलाब में कलियाँ लगी हैं, कितनी प्रतीक्षा के बाद ! काँटा चुभ गया
 है ।  जरा गेंदे के पत्ते का रस तो लगा दो, ए देवयानी ? देखना, माँ को मत बताना । ...
आह ! वह सब कहाँ छोड़ आए तुम आभास ! ओ माँ ... ! मैं अपना जीवनाधार कहाँ खो आया ! कैसे जी सकूँगा मैं !
आभास बसु, यू नास्टैल्जिक इडियट ! तुममें यही कमी है । अभी वहाँ सुबह हुई होगी लेकिन यहाँ तो रात घिरती चली आ रही है । रात !

"क्या  तुम दोनों शादी करना चाहते हो ?"
"कौन  दोनों ?"
"तुम और सपना, और कौन !"
"मुझे  नहीं मालूम ।"
"माँ  से क्यों छिपाते हो आभास, खुलकर बोलो ?"
"मैं  क्या बोलूँ ! मैंने इसके बारे में तो कभी सोचा नहीं । वह क्यों करने लगी मुझसे शादी ?"
" तो फिर ? किस तरह का संबंध् है यह ?"
"मतलब ? संबंध् है बस ! वैसे दोस्ती का रिश्ता ही कहा जाएगा । इसमें परेशान होने की तो कोई बात नहीं ।"
"क्यों  नहीं है परेशान होने की बात ?"
"तो  होती रहा करो परेशान । यहाँ इन बातों का मतलब नहीं कुछ भी ।"
"मैं  जानती हूँ तुम यह सब क्यों कर रहे हो !"
"........"
"तुम्हारे बाबा ने ही पूछने को कहा था । मुझे क्या, जहाँ करनी हो करो शादी !"
"सचमुच तुम्हें अब कुछ नहीं ?"
"नहीं, कुछ नहीं !" माँ गुस्से में उठकर चली गई हैं । अब उन्हें आभास की शादी से कोई मतलब नहीं ! वे अब अमेरिका में जो हैं । यहाँ कोई सवाल-जवाब नहीं, कोई स्टेटस सिम्बल नहीं क्योंकि उस लायक फिलहाल तो औकात भी नहीं है । तो फिर क्या है ! क्यों रहे मतलब ! हुँह, सपना से शादी ! ऐसी बिछी जा रही है सपना जैसे । करोड़पति एन.आर.आई. की बेटी के लिए एक महाशय आभास बसु ही सुयोग्य वर बच गए हैं !

तब से तीन दिन बीत गए हैं । माँ कुछ बोलती नहीं, कोई बातचीत नहीं करती । आभास अपनी उलझनों में घिरा है । उसे जैसे इसकी परवाह नहीं । कैलिफोर्निया इन दिनों शीतलहर की चपेट में है । सारे स्पेस जैसे ठंडे  हो गए हैं, जम गए हैं । बाबा कुछ निस्पृह से दिखते हैं, इन दिनों विक्रम सेठ की किताब पढ़ रहे हैं - अ सुटेबल बॉय  !
"हाय हैण्डसम ! क्या कर रहे हो ? इधर फ़ोन नहीं किया ?" सपना ने फोन पर आभास का हाल पूछा।
"हैलो सैपी, बस ठीक हूँ । तुम कैसी हो ?"
"आय एम फाइन, बट तुम्हें देखने की फुर्सत  कहाँ है !"
"नहीं -नहीं, ऐसी बात नहीं । बस ... तुम तो जानती ही हो कैसे चक्कर में फँसा हूँ ।"
"तूम्हें चक्कर से बाहर निकालने की ही तो कोशिश हो रही है । तुम्हें एक खबर दूँ तो मुझे क्या दोगे ?"
"क्या  खबर है सैपी ?" आभास का दिल धड़का ।
"बस, मुफ्त में खबर लोगे ?"
"बोलो, क्या लोगी ?"
"अच्छा रहने दो, बाद में माँग लूँगी । तुम तो नर्वस हो गए।" सैपी हँसकर बोली ।
"डैड  हैज टाॅक्ड टु योर सी.ई.ओ. । तुम जाकर उनसे मिल लो । संभल बात करना । अभी किसी तरह यह फेज निकल जाने दो, फिर देखा जाएगा । है न ?"
"आय एम थैंकफुल टु यू सैपी । आय एम आॅब्लाइज्ड । आय विल डु द नीडफुल सैपी!"
"आॅब्लाइज्ड तो हम हैं यार, तुमने हमें मौका जो दिया !" सैपी हँसी और फोन डिस्कनेक्ट कर दिया ।
बहुत दिनों बाद आभास थोड़ी राहत महसूस कर रहा था। उसने परितोष को फोन लगाया, यह खबर सुनाने
को ।
"तुम्हारा आइडिया तो क्लिक कर गया परितोष !"
"क्या  हुआ आभास ?"
"सैपी के फादर ने सी.ई.ओ को अप्रोच किया है। कल मुझे मिलने जाना है ।"
"ओ आभास, दिस इज इनडीड ग्रेट । यू हैव मेड मी सो हैप्पी । यार, मेरे दिल पर एक बोझ था । तुम्हारे खालीपन को मैं हजम नहीं कर पा रहा था । चलो, अब शुरू करो फिर से ।"
"हाँ , देखो मौका मिला तो कल भेंट  हो सकती है ।"
"मैं  इंतजार करूँगा ..."
"लेकिन देखो, अभी किसी को बताना नहीं, ओके ?"
"ओके आभास !"
आभास अच्छी तरह तैयार होकर गया, अपना सबसे अच्छा सूट पहनकर । अंदर कार्ड भेजने के आध घंटा बाद उसे बुलाया गया ।
"इन फैक्ट वी डोन्ट हैव ऐनीथिंग मैचिंग योर क्वालिफिकेशंस । व्हाट वी कैन डू इज टु आॅफर यू अ जाॅब रिलेटेड टु मेन्टेनेन्स आॅफ मैशीन्स ऐण्ड मैटेरियल । यू विल हैव टु वर्क ऐज अ मेन्टेनेन्स असिस्टेन्ट ।"
"बट सर ..." आभास का माथा एकबारगी चक्कर खा गया ।
"नो  साॅरी, वी कैनोट एनटरटेन ऐनी डिस्कशन ... यू हैव टु रिपोर्ट टु अस विदिन टू डेज, अदरवाइज दिस आॅफर शैल स्टैण्ड कैंसिल्ड ।"

बाहर निकला तो आभास की आँखों में आँसू थे। उसका बदन थरथरा रहा था । इतना अपमान ? उसे मशीनों की मरम्मत यानी मिस्त्री  का काम करना पडे़गा ? हे भगवान, कोई सुनेगा तो क्या कहेगा । इंजीनियरिंग के बड़े-बडे़ उस्ताद जिसके जीनियस का लोहा मानते हैं उसे एक साधरण मेन्टेनेन्स स्टाफ का काम करना पड़ेगा ! छिः, यह कैसे हो पाएगा ! इससे तो अच्छा है कि कैलिफोर्निया की खाड़ी में डूब मरूँ !
कहीं कोई उसे देख न ले और सवाल न पूछ बैठे, आभास झट उस बहत्तर मंजिली इमारत के बाहर आ गया। वह बदहवास था लेकिन नाजुक मौका था और उसे इस बार अकल से, युक्ति से काम लेना था । सपना उससे पूछेगी कि क्या हुआ ? उसे क्या जवाब देना चाहिए ? परितोष रात को फोन जरूर करेगा, उसे क्या बताना चाहिए ? इस जाॅब से वीजा का रीन्युअल हो जाएगा, साल भर के लिए तो हो ही जाएगा ! अभी की अनिश्चितता खत्म हो जाएगी । पास का पैसा तेजी से खत्म हो रहा है, कुछ तो आमद हो जाएगी । घर में बूढे़-बुजुर्ग हों तो पैसे की जरूरत कभी भी आन पड़ सकती है, वह भी परदेस में ।
क्या करे आभास ! कोई और विकल्प नहीं दीखता । क्या उसे यह समझौता करना ही पड़ेगा - अपने को इतना गिराकर ? शायद ! बेचना खुद को - यही अपने बस में है, दाम लगाना तो अपने बस में रहा नहीं । अब यही होकर रहेगा ।
जैसी कि प्रत्याशा थी, पहले सपना का ही फोन आया । उसने उसे बताया कि उसे आॅफर मिल चुका है और वह वापस ज्वायन करने वाला है । फिर परितोष का फोन आया शाम के वक्त । वह आभास की प्रतीक्षा करता रहा था दफ्तर में । आभास ने अगले दिन उससे मिलने का वायदा किया ।
जरा इत्मीनान हुआ तो आभास को सहसा देवयानी की याद हो आई । उसने डायरी में से उसका फोन नम्बर निकाल कर उसे फोन लगाया । मासी ने फोन उठाया। अमेरिका से फोन आया जानकर वे खासी उत्तेजित हुईं, फिर उसका हाल पूछकर उन्होंने देवयानी को फोन पकड़ा दिया ।
"कैसे याद किया आभास इतनी सुबह ?"
"देवयानी ..."
"हाँ , बोलो आभास ..."
"यहाँ तो रात ..."
"हाँ  बाबा, जानती हूँ! तुम कैसे हो ? मासी-मौसा कैसे हैं ?"
"सब ठीक है । ... देवयानी ... तुम कैसी हो ?"
"........… " देवयानी ने क्या सुना नहीं ? आभास ने अपना गला साफ किया, अपने को स्थिर करने की कोशिश की ।
"देवयानी ... ?"
"हाँ  आभास ? बोलो, तुम्हारा बिल उठ रहा होगा ?"
"कैसी हो ?"
".........." क्या देवयानी रो रही है ? जवाब क्यों नहीं देती ?
"तुमने कहा था न देवयानी, मुझे पाने के लिए कितना मोल ... तुम्हें देना पड़ेगा ?"
"........."
"मैं  ... मै तो ... बिना मोल तुम्हारा था देवयानी, अब समझ पाया हूँ । बिका तो यहाँ आकर हूँ मैं ... सुनती हो देवयानी ? ... कौडि़यों के मोल ! मैं ..." आगे आभास से कुछ कहा न गया ।
"क्या  हुआ ? कोई क्लेष है आभास, कोई टेंशन ? ... मैं तो तुम्हारे योग्य थी ही नहीं । ... इसीलिए न हमेशा के लिए मैं ... बहुत दूर चली जा रही हूँ । ..." तभी मासी ने पफोन हाथ में ले लिया µ
"क्यों  रे, तु देवयानी के विवाह में आ तो सकेगा आभास । हमें बहुत अच्छा लगता ..."
आभास ने फोन कान से हटाकर हाथ में ले लिया । उधर  से अब भी मासी लगातार बोल रही थीं । आभास ने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया । उस एक पूरी दुनिया से उसका एकबारगी जैसे विच्छेद हो गया । बिस्तर में दुबककर वह देर तक रोता रहा - निःशब्द, चुपचाप !

इराक में प्रतिरोध् समाप्त हो चुका था - सुबह तैयार होते-होते आभास ने टीवी पर यह खबर सुनी । वह हड़बड़ी में था । उसे ड्युटी पर रिपोर्ट करना था ।
"तुम्हारी छुट्टी खत्म हो गई आभास ? बहुत जल्दी तैयार हो गए ?य् बाबा ने पूछा ।
"हाँ , खत्म हो गई ।य् उसने धीरे-से जबाव दिया ।
"बेटा, तुम आजकल बहुत गंभीर रहते हो, क्या बात है ?"
"नहीं तो !"
"मुझे लगा ऐसा ... कोई समस्या तो नहीं है ?"
"समस्या क्या होगी !"
"तब तो ठीक है । सुनो, मैं अमेरिकी नागरिकता कानूनों के बारे में जानना चाहता हूँ, कोई मैटेरियल मिले तो लेते आना ।"
आभास ने नजर उठाकर बाबा को देखा, कहा कुछ नहीं ।
" इसलिए कह रहा हूँ कि हमें अब इस दिशा में कोशिश शुरू कर देनी चाहिए, जीवन में स्थायित्व आना चाहिए न ?" आभास ने कोई जवाब नहीं दिया और बाहर निकल गया ।

रिपोर्ट करने के लिए भारी मन से उसने केबिन में प्रवेश किया तो सामने स्वयं परितोष बैठा था । उसके कदम जैसे जम गए । परितोष ने स्वयं उसे कुर्सी पर बैठाया ।
"मुझे अभी-अभी पता चला आभास । विश्वास करो मैं कुछ भी नहीं जानता, इन्होंने यह सब कैसे किया । ... मैं लज्जित हूँ आभास, मुझे माफ कर दो । मैं इस लायक नहीं कि तुम्हें अपने सबाॅर्डिनेशन में रखूँ - वह भी इस काम के लिए । तुम्हें मुझ पर तो विश्वास है आभास ?"
"मैं  जानता हूँ, तुम इसमें कहीं नहीं हो । ... लेकिन देखो परितोष, इस बारे में प्लीज किसी को बताना नहीं
यार ! बस इतना ख्याल रखना, प्लीज ।" आभास कातर हो उठा तो परितोष ने उसे छाती से लगा लिया ।
परितोष ने बताया था उसकी हालत ठीक नहीं है । जबकि उसके माता-पिता को इस बारे में कुछ भी मालूम नहीं । शायद उसकी उस गर्लफ्रेन्ड सैपी को भी नहीं । यह भी संभव है कि उसे सब कुछ मालूम हो और वह अनुकूल परिस्थितियों का इंतजार कर रही हो । आखिर आभास का तारणहार वही है, वही है जो उसे ग्रीन कार्ड दिला सकती है । आभास ने परितोष को एक दिन बताया था कि सपना मन ही मन उसके नाॅस्टेल्जिया की कद्र करती है !    ( कहानी संग्रह : 'मुन्ना बैंडवाले उस्ताद', भारतीय ज्ञानपीठ में संगृहीत )

                                                                                                              -शिवदयाल

                                                                                                                   sheodayal@rediffmail.com

कहानी 

                  मुन्ना बैंडवाले उस्ताद

                                          - शिवदयाल   

इतनी-सी बारात पार्टी और इतना विलम्ब! कुल पचास-साठ से ज्यादा लोग नहीं रहे होंगे। जमाने के हिसाब से यों बाराती कुछ संकोची और गम्भीर दिखते थे। हम वधू पक्षवाले कोई घंटे भर से उनके सत्कार के लिए खड़े थे, बल्कि थक गये थे। कई लोग तो नौ बजे के बाद घर लौटने लगे थे। मेरा भी यही विचार था। मैंने पत्नी को बताया तो कहने लगी- मौसी बुरा मानेंगी। कम से कम बारात लगने तक तो रुकना पड़ेगा। शादी पत्नी की मौसेरी बहन की थी, गो सीधी मौसेरी बहन नहीं, उसकी माँ की चचेरी बहन की लड़की। मरता क्या न करता, मुझे खड़ा रहना पड़ा। अब जब कि बारात लग ही रही थी तो मैं बहुत राहत महसूस कर रहा था।

बारात पार्टी के कुछ नौजवान सदस्यों में जोश था। वे आत्ममुग्ध से क्लैरिनेट और ड्रम की बीट्स पर मटक रहे थे। बारात है, बाजा है तो नाच है। कुछ महिलाएँ भी बारातियों में शामिल थीं और उनमें से कुछ तालियाँ बजा-बजाकर नाचनेवालों का उत्साह बढ़ा रही थीं। मेरे सबसे नजदीक सोजोफोन लिये एक बाजावाला खड़ा था। मुझे इसका गुमान तब हुआ जबकि उसकी भारी और कर्कश आवाज ने मुझे बुरी तरह चैंका दिया। जैसे बकरियों की मिमियाहट के बीच सहसा शेर ने दहाड़ मारी हो।

ड्रम तेज होकर अचानक खामोश हो गया - ढन्-ढना-ढन-ढन्! कुछ ही क्षणों बाद क्लैरिनेट की सुरीली आवाज फिज़ा में उभरी। मालूम पड़ता था कि इस नयी धुन के खामोश होने के बाद ही बाराती-घराती गले मिल पाएँगे। मुझे बहुत ताज्जुब हो रहा था। नयी धुन पुराने फिल्मी गाने की थी-“पंख होते तो उड़ आती रे ... ”, मैं उस उत्सव भरे माहौल से जैसे ऊपर उठ गया - हवा में। पहले तो लगा मानो बहुत दूर कहीं यह धुन बज रही है, फिर लगा यह धुन मेरे ही अन्दर बज रही है, जाने कब से बज रही है - बरसों से। मुझे आश्यर्च वैसे इस बात पर भी हो रहा था कि आज के इस ’राॅक’ और ’पाॅप’ के दौर में बाजेवाले इतनी हिम्मत का काम कैसे कर बैठे कि 'पंख होते तो उड़ आती रे......’ बजा लें। मेरी दिलचस्पी अब बारातियों की बजाय बाजावालों में थी। पोशाक उनकी अच्छी थी। लाल, हरे, सुनहरे रेग की यूनिफार्म में वे सजे-धजे थे लेकिन क्लैरिनेट वाला आदमी यानी मास्टर पतलून-कमीज में था। धुन मुश्किल थी। वह जब बाजे में फूँक मारता तो उसके गाल छोटे-छोटे गुब्बारों की तरह फूल जाते और गर्दन का रेशा-रेशा ऐसा तन जाता कि मानो अब फटा कि तब। जबकि चेहरा पसीने से तर-ब-तर जिस पर वह अवकाश मिलने पर रूमाल फिरा लेता। ड्रमवाला कहीं प्रफुल्लित दिखता था। नौजवान था सत्रह-अठारह का, गोरा, खूबसूरत। ड्रम ठोकते हुए बार-बार उस्ताद को देख लेता था। एक बार किंचित् तेज ठोक बैठा हो, उस्ताद ने झट उसकी ओर कड़ी नजरों से देखा और हाथ से इशारा किया-हौले से, आहिस्ता से।

“पंख होते तो उड़ आती रे .......।” मैं बाजेवाले को देख रहा था और कभी-कभी फूलों से सजी-धजी कार के अन्दर बैठे दूल्हे को भी देख लेता था, जो गर्मी से परेशान दिखता था। लेकिन मेरा मन न जाने कहाँ, किन दिशाओं में भटक रहा था। पता नहीं मैं क्या भूल रहा था और क्या याद कर रहा था। तभी ड्रमवाले ने शायद फिर गलती की। उस्ताद इस बार फिर गुर्राये। वह झेंपकर हँसने लगा, जैसे अपनी गलती मान ली हो। उस्ताद अब बिल्कुल मेरे सामने खड़े थे। गहरा साँवला परेशान चेहरा, उभरी हुई कनपटियों की नसें, तलवार-कट मूँछें, किन्हीं सोच में दाखिल आँखों के ऊपर छोटी भवें, लम्बी-सी नाक और अधपके बाल छोटे-छोटे। बायीं गाल पर नाक की जड़ के पास एक बड़ा-सा मस्सा भी दूधिया रोशनी में दिखने से बच न सका।

“अजीज मियाँ....” बेसाख्ता मेरे मुँह से निकला। ’अरे, यह तो अजीज मियाँ हैं’- मैंने अपने आप से कहा। अजीज मियाँ ने अपने आस-पास देखा लेकिन मुझे नहीं और अपने साथियों को एक ओर जाने को कहकर खुद भी उनके पीछे हो लिये। अब द्वार-पूजा हो रही थी, मंगल-गान गाती स्त्रियों में थोड़ी आपाधापी थी।

“अजीज मियाँ? आप अजीज मियाँ हैं न?” मैंने उन्हें पीछे से पुकारा। वे रुक गये और पीछे मुड़कर मुझे देखा, अपरिचित निगाहों से।

“मुझे पहचाना? मैं सूरज! आप तो बूढ़े हो गये एकदम?” मैं हँसने लगा। वे मुस्कराये लेकिन जैसे अभी मुझे पहचान नहीं पाये थे।

“याद आया? मैं सूरज ........ भरत बाबू का लड़का .........?”

“अरे बाबू आप? आप तो इतने कद्दावर और सयाने हो गये हैं। मैंने तो सच ही नहीं पहचाना।”

“मेरे रिश्तेदार की बेटी की शादी है। मैंने तो आपको पहचान लिया। आपने ऐसी धुन ही बजायी जो और कोई बजा ही नहीं सकता। ” मैं फिर हँसने लगा।

“आप तो नाहक मुझे बना रहे हैं। और सुनाइए, सब खैरियत तो है? बाबूजी कैसे हैं? चाची कैसी हैं?”

“सब लोग ठीक हैं लेकिन आपने ये आप-आप क्या लगा रखी है? मैं तो वही पुराना सूरज हूँ अजीज मियाँ।’’

“आपका बड़प्पन है बाबू आप इतने बड़े हो गये तो आपको तो आप ही कहूँगा न।”

“अच्छा नहीं लगता।”

“अच्छा बाबा क्या हो रहा है इन दिनों ? शादी-ब्याह किया कि नहीं?”

“नौकरी हो रही है। शादी हुए तीन साल हुए। साल भर का एक बच्चा भी है अब तो ।”

“खुदा सलामत रखे, बरकत दे। खूब फूलो-फलो .......”

“और आप कैसे हैं? बाल-बच्चे सब कैसे हैं?” अजीज मियाँ हँसे, मुँह उठाकर। मुझे कुछ समझ में नहीं आया। तब तक ट्रे में नाश्ता चला आया। मैंने उन्हें पकड़ाया। मैं खुद तो कर चुका था।

“लीजिए, आप हँस क्यों रहे हैं?”

“तो क्या करें, तुमने बात ही ऐसी पूछ ली?”

“क्यों? आपके बच्चों के बारे में ही तो पूछा।”

“कोई हो तब तो बताएँ बाबू।” वे फिर हँसे।

“ओह लेकिन ऐसा क्यों?”

“शादी होती तभी तो औलाद होती।”

“क्या कहते हैं, अजीज मियाँ! आपने अब तक दुनिया भर के लोगों की बारातें सजायीं और खुद....?”

“यही तो ऊपरवाले का खेल है। उसने मुझे इस लायक समझा ही नहीं। और मैं भी फिजूल झंझटों से बच गया।”

सहसा मुझे उनकी जवानी याद आ गयी। हम तब बच्चे थे, यही कोई आठ-दस बरस के। उनकी बहन और मेरी बहन अच्छी सहेलियाँ थीं। दोनों साथ-साथ स्कूल जाती। हालाँकि बाद में अनारो, हाँ यही नाम था उनका, ने स्कूल जाना बन्द कर दिया था। लेकिन दोनों सखियों की दोस्ती को इससे खास फर्क नहीं पड़ा था। मैं भी बहन के साथ कभी-कभी उनके घर जाता। उनके अब्बा को हमारे यहाँ सभी खाँ साहब कहते थे। वे दमा के मरीज थे और अक्सर खाँसते रहते। मैं जब कुछ सयाना हुआ तब समझ हुई कि 'खाँ साहब’ की संज्ञा का उनकी खाँसी से कोई सम्बन्ध नहीं था, बल्कि उनका नाम ही था मुहम्मद बशर खाँ। तब नेम प्लेटों का चलन नहीं था, वह भी निम्न-मध्य वर्ग में। हम बच्चे तो उस वक्त नेम प्लेट को साइन बोर्ड ही कहते थे और एक-दूसरे के पिताओं के ठीक-ठीक नाम नहीं जानते थे। खैर, खाँ साहब अक्सर होठों में बीड़ी दबाये रहते और उनकी बकरी, जो दरअसल बकरा हुआ करता था, को पत्ते वगैरह खिलाने में मशगूल रहते। लम्बे सफेद बालों से उनका आधा माथा ढँका रहता। हम बच्चों को उनके बकरे में खासी दिलचस्पी थी। हम जब भी उसे छूते या छूने की कोशिश करते, वह उछल-उछलकर हमें अपनी छोटी-छोटी सींगों पर तोलने की कोशिश करता। यह खेल का उसका तरीका था। फिर एक दिन अचानक उनका बकरा गायब हो जाता। हम अन्दर से रुआँसे हो जाते और उसकी चिकनी-चमकीली-चितकाबरी खाल और लम्बे-लम्बे कान याद करते रह जाते। तब तक नया मेमना खूँटे से बँध जाता।

अजीज मियाँ और हमारे परिवार के बीच रिश्ते की एक और कड़ी थी और वह था भूरे रंग का एक रोबदार कुत्ता । था तो खाँटी देशी लेकिन दुनिया भर के अलशेशियंस पर बीस बैठता था। उसका डील-डौल और उसकी गुर्राहट अच्छों-अच्छों का खून जमा देती थी। खाँ साहब को वह कुत्ता बहुत प्यारा था मगर उनको हमेशा मलाल रहा कि हमलोगों ने उनके कुत्ते को उनका नहीं रहने दिया। कम्बखत खाता उनका था मगर वक्त काटने के लिए उसे जैसे हमारे घर का अहाता ही मुफीद पड़ता था। उसे किसी ने जहर दे दिया था, वह मरा भी तो ऐन हमारे आँगन की चौखट पर।

मुझे अजीज मियाँ के घर जाना हमेशा अच्छा लगता क्यों कि मुझे वहाँ वह सब कुछ देखने-सुनने को मिलता जो और किसी के यहाँ मैंने कभी नहीं देखा। अनारो दीदी हमेशा सफेद, मटमैले से दुपट्टे से अपना सर ढँके रहती। उनकी अम्माँ बराबर पान चबाती रहतीं। उनके दाँत बिल्कुल काले थे, वे हँसतीं तो कभी-कभी डर लगता। नाक में उनके सोने की मोटी-सी कील (लौंग) चमकती रहती जो चमकती कम थी दिखती ज्यादा थी। वैसे वे हँसमुख महिला थीं और हमसे खूब हालचाल पूछती थीं। हाँ, टूटे-फूटे पलस्तरवाले बरामदे में एक कोने में रखा टोंटीवाला लोटा (बधना) मुझे सबसे ज्यादा चकित करता। मुझे हैरत होती कि आखिर उस लोटे में नलकी की क्या जरूरत थी। वह हमेशा चाय की केतली का स्थानापन्न ही नजर आता। बाद में मैंने अपनी अम्माँ से एक बार वैसा ही लोटा खरीदने की सिफारिश की तो वे देर तक मुझे गोद में लिये हँसती रहीं।कुतूहल के और भी सामान थे जिन्हें मैं कभी छूकर तो कभी दूर से निहारा करता। टिन की गहरी, बैंगनी रंग के किनारेवाली प्लेटें उस घर के सिवा कहीं नहीं दिखतीं। लकड़ी के एक गन्दे से आले पर आईना रखा होता जिसकी परत जगह-जगह से झाँक रही होती। उसके एक ओर मीनारों के रंग-बिरंगे चित्र और अरबी में लिखी इबारतें मुझे कभी समझ में नहीं आतीं। हम दोस्तों के बीच अक्सर चर्चा होती कि अजीज मियाँ के घर में भाला-बल्लम और चमचमाती तलवारें हैं, लेकिन इसी कमरे के कोने में मुझे बस एक लम्बी-सी बरछी खड़ी दिखाई देती जिसके फल पर जंग लगी होती। आईनेवाले आले पर इत्र की छोटी-छोटी रंग-बिरंगी शीशियाँ रखी होतीं। कभी-कभी अजीज मियाँ एक छोटे पनडब्बेनुमा डब्बे से रुई का फाहा निकालकर उसे एक सींक में लपेट देते और उसे इत्र में डुबोकर मुझे पकड़ा देते। इत्र की वह महक अब तक मेरी साँसों में वैसी की वैसी बनी हुई है। उन मुहल्लों में बीते बचपन की मीठी यादें उस महक से सराबोर हैं, सुवासित।    

अजीज मियाँ को घर में लोग मझलू कहकर पुकारते थे। दरअसल उनसे भी छोटे एक भाई थे जो बचपन में ही गुजर गये थे। इस तरह मँझला होने के कारण वे मझलू कहे जाते थे। उनके बड़े भाईजान बड़े धीर-गम्भीर-से दिखाई देते। हम उनके पास फटकने से भी डरते। बड़े मियाँ का कुछ कारोबार था। क्या था, न कभी हमें मालूम हुआ न समझ में आया। हम उनके घर जब भी गये, खाँ साहब को मझलू मियाँ को ही खरी-खोटी सुनाते देखा। जबकि अजीज मियाँ हमारे लिए सचमुच बड़े अजीज थे। वे हमसे बहुत हिलगे रहते। बाद के दिनों में जब खाँ साहब ने मुर्गीखाना खोेला तो अजीज मियाँ हमारे अनुरोध पर कभी-कभी नन्हे चूजों को एकदम पास से देखने की इजाजत दे देते। हम चूजों को देखकर हैरान और उतने ही खुश होते और मन ही मन अजीज मियाँ को बहुत धन्यवाद देते।

अनारो दीदी अपने मझलू भाईजान की तारीफ करने का कोई मौका नहीं छोड़ती थीं। मेरे घर में हालाँकि उन्हें एक दो टके का आदमी ही समझा जाता था, उन्हें गम्भीरता से लेने की बात तो दूर रही। मैट्रिक में कई बार फेल होकर उन्होंने आखिरकार पढ़ाई ही छोड़ दी थी। मेरे घर में बेपढ़े लोगों को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था। वैसे अपने शौकों को लेकर मेरे घर में भी वे अक्सर चर्चा में रहते। मुझे एक दफा कुकुरखाँसी हो गयी थी तो उन्होंने फूँक मारकर पानी पिलाया था। मुझे तो याद नहीं लेकिन अम्माँ कहती है, मैं तीसरे दिन एकदम ठीक हो गया था। उनके दूसरे शौक के बारे में हम बच्चों को कुछ अजब ही ढंग से पता चला।

मुहल्ले की मुख्य सड़क पर बाजार के नजदीक बाजे की एक दुकान थी- 'मुन्ना बैंड’। यहाँ अक्सर रियाज चल रहा होता, खासकर दोपहर के समय। नये-पुराने फिल्मी गानों की धुनें बजती रहतीं। शादी-ब्याह और देशभक्ति गीतों की धुनें भी कभी-कभी बजती होतीं। हम घरवालों की नजरें बचाकर कभी-कभी उस दुकान के सामने जाकर चुपचाप खड़े हो रहते। उस्ताद बूढ़े थे, बड़े-बड़े सन जैसे बालोंवाले। वे क्लैरिनेट बजाते और शागिर्दों को हाथ से, आँख से निर्देश देते जाते। उनके गाल दो छोटे गुब्बारे बन जाते और गर्दन की मानो झिल्लियाँ तक दिखाई देने लगतीं। हम धुनों से ज्यादा चेहरों और बाजों में दिलचस्पी रखते। शागिर्द उस्ताद से बहुत भय खाते। वे सहमे हुए चुपचाप उनका निर्देश मानते।

एक दिन जब हम वहाँ पहुँचे तो उस्ताद हमें देखकर मुस्कराये। वे अबतक हमें पहचानने लगे थे। हमारा नाम पूछा और बैठने को कहा। हम चुपचाप बेंच पर बैठ गये। धुन शुरू हुई -“पंख होते तो उड़ आती रे, रसिया ओ बालमा.......।” उस्ताद के क्लैरिनेट से संगीत लहरी गूँजी। उसके पीछे बाकी साज सक्रिय हुए। ड्रमर को उस्ताद ने बीच में रुककर धुन की बारीकी समझायी और ट्रम्पेटवाले को बाजा पकड़ने का कायदा सिखाया। और तब हम देखकर चैंक गये कि ट्रम्पेट और कोई नहीं, अजीज मियाँ सँभाले बैठे थे। मेरे मुँह से अचानक निकला - 'अजीज मियाँ.. ' । वे देखकर मुस्कराये लेकिन जैसे घबराये भी। मुँह पर अँगुली रखकर मुझे चुप रहने को कहा। वे अच्छा बजा ले रहे थे। हमारे सामने ही गाना खत्म होने पर उस्ताद ने उन्हें शाबाशी दी लेकिन डाँट भी पिलायी, “अबे लौंडे, खामख्वाह तू क्यों इस शौक के पीछे पड़ा है? यह बर्बाद करनेवाला है! खाँ साहब सुनेंगे तो उन्हें अलग तकलीफ होगी। तू कोई धन्धा सँभाल, यह गाजे-बाजे का झमेला छोड़।“ अजीज मियाँ ने झेंपकर अपनी दुपल्ली टोपी ठीक की और मुस्कराकर मुझे देखा।

हम साथ-साथ घर लौटे। रास्ते में हम बच्चों को उन्होंने लेमनचूस खरीद कर दिया और कहा कि यह बात हम कभी किसी से नहीं कहेंगे। खासकर उन्होंने मुझे इस बात के लिए सख्त ताकीद की। इस बात को कोई चार-छह महीने गुजरे होंगे कि बाबूजी का तबादला हो गया। अजीज मियाँ और उनके कुनबे का किस्सा वहीं खत्म हो गया।

“ये धन्धा कैसा चल रहा है?”

“कैसा क्या, बस किसी तरह गुजर हो जाती है बाबू!”

“चाचा कैसे हैं?” वे प्लेट में बची नमकीन खा रहे थे।

“अब्बा का इन्तकाल हो गया। कई बरस हो गये।”

“अरे! और चाची?”

“अम्माँ हैं। बिस्तर से लगी हुई हैं।”

“ओह! और सब लोग कैसे हैं? अनारो दीदी ?”

अजीज मियाँ पास पड़ी मेज से पानी का गिलास उठा ले आये। पानी पीकर हाथ-मुँह पोंछा और कुर्सी पर पीठ टिकाकर आराम से बैठ गये। कहने लगे -“तुम तो जानते हो बाबू, हमने फाके भले ही न किये हों लेकिन इत्मीनान में भी कभी नहीं रहे। अब्बा के रिटायर होने के बाद हम वाकई बड़ी परेशानियों में रहे। हम दो भाई, दोनों ही नकारे। अब्बा इसी गम को लेकर गये। उन्होंने हमें अपने पैरों पर खड़े होने के कई मौके दिये लेकिन हम सच में नाकाबिल औलाद निकले। अब्बा के पास ज्यादा कुछ नहीं था और जो भी था बहुत मुश्किल से कमाया हुआ। बड़े भाईजान ने कारोबार में हजारों डुबोया। उन्होंने कितने ही धन्धे शुरू किये और बन्द कर दिये। अब्बा को फिर भी उन पर भरोसा था। भाईजान ने अब्बा के भरोसे को समझा नहीं। खैर...!  बड़ी आपा की शादी तो बहुत पहले हो गयी थी, एक अनारो रह गयी थी। हमारा ध्यान तो इस जिम्मेदारी पर था नहीं। आखिर अब्बा की कोशिशों से रिश्ते में ही एक जगह बात पक्की हो गयी। अनारो भी अपने घर चली गयी। लेकिन तकदीर को क्या कहा जाए, ससुरा जमाई दगाबाज निकला। पैसेवाला था। चमड़े का काम करता था। अनारो से निकाह के साल भर बाद ही उसकी सौत घर में ले आया। हम पर बिजली गिर पड़ी। अब्बा एकदम पस्त हो गये। अनारो हमारे पास ही चली आयी। वह माँ बननेवाली थी। बच्चे की पैदाइश पर उसे देखने उसका बाप भी आया। हमने उसकी खूब ख़बर ली। उसने हमें भरोसा दिलाया कि अनारो को खाने-कपड़े के लिए कभी किसी का मोहताज नहीं होना पड़ेगा। अनारो मानती नहीं थी। हमने उसे बहुत समझाया और बच्चे की परवरिश का वास्ता दिया। आखिर अनारो वापस चली गयी। अब भी बरस दो बरस पर आ जाती है। उसे देखकर तकलीफ तो बहुत होती है लेकिन हम आखिर क्या करें।

अब्बा मुझे सरकारी मुलाजिम बनाना चाहते थे। मेरा मन मगर किताबों में कभी लगा ही नहीं। जैसे-तैसे करके दसवीं तो पास कर गया, मैट्रिक तीन बार देकर अन्त में छोड़ दिया। ऐसी हालत होती थी मेरी, सवाल हाथ में आते ही गोया बदन काँपने लगता, कलम जमीन पर गिर पड़ती, दिमाग में भन्न-भन्न करता सन्नाटा छा जाता। अब्बा को इसकी बहुत तड़प थी। भाईजान पर वे पहले ही बहुत गँवा चुके थे, मुझपर गँवाने के लिए उनके पास कुछ था भी कहाँ। फिर भी उन्होंने मुझे बनाने के वास्ते अपनी ताकत के हिसाब से बहुत कुछ किया। सबसे पहले मुर्गीखाना खोला। पहले तो अच्छा चलता रहा, फिर धीरे-धीरे इतना उधार चढ़ता गया कि सब कुछ बेच-बाचकर समेट लेना पड़ा। धन्धा था तो अच्छा लेकिन मेरी किस्मत!    

हमारे रिश्तेदार की टेलरिंग की एक दुकान थी। मुर्गीखाना फेल होने के बाद अब्बा ने उनसे बात करके मुझे वहाँ बैठने को भेजना शुरू किया। मुझसे हमेशा चूक होती रहती। पहले तो उन्होंने नादानी समझकर इसपर तवज्जो नहीं दी। बाद में मुझे डाँट पड़ने लगी। ऐसा नहीं था कि काम मैं नहीं सीख रहा था। खूब ही सीख रहा था। रेडियो पर तब बड़े अच्छे गाने आते थे। रफी साहब के गानों में ऐसा खो जाता कि भूल ही जाता कि काज के साथ ही बटन लगना चाहिए, कि सिलाई अगर बाल बराबर भी इधर से उधर हो जाए तो कम्बख्त फिटिंग खराब हो जाती है। लेकिन मैं अपनी फितरत सेे लाचार था। जहाँ कोई अच्छा गाना बजता, मैं उसकी धुनों की पैमाइश करने लगता। अब्बा के समाने, उनके रहते कभी गाने की हिम्मत न हुई। सोचा कि बाँसुरी ही खरीदकर कभी-कभी दिल बहला लिया करूँ लेकिन उसके लिए भी तो आखिर कोई जगह चाहिए थी। तभी मुन्ना बैंडवाले उस्ताद से जान-पहचान हुई। मुझे जैसे मुँहमाँगी मुराद मिल गयी। अब्बा का दबदबा था। पहले तो उन्होंने कुछ भी सिखाने से बिल्कुल इनकार कर दिया लेकिन मैंने वहाँ जाना छोड़ा नहीं। आखिरकार मैं ही जीता। उन्होंने मुझे साज बजाना सिखाया। सुनने की तमीज भी उन्होंने ही सिखायी। वो बराबर मुझे कहते रहते कि साज से इश्क औरत से इश्क से भी ज्यादा खतरनाक है। लेकिन इश्क अगर हो जाए तो फिर क्या उससे बचने की गुंजाइश  बचती है? यह तो बाद में हुआ कि मैंने औरत से इश्क का मजा भी चखा और दोनों जहाँ से गया।

मुन्ना बैंड की बैठकियों ने टेलरिंग से नाता छुड़ा दिया। जो भी पाँच-दस रुपये जेब-खर्ची के मिल जाते थे, सो भी गये। उस्ताद ने सुना तो मुझपर खूब बरसे। मैंने उनके हाथ अपने हाथों में लेकर उन्हें चूमा, उन्हें अपनी आँखों से लगाया और उनपर आँसुओं की झड़ी लगा दी, “उस्ताद, हमें न छोडि़ए ऐसे बीच धार में। हमें पार उतारिए! अल्लाह जानता है मैंने उससे कभी कुछ नहीं माँगा। मैं आपसे भीख माँगता हूँ। मैं मर जाऊँगा। बाजे में साँस फूँकता हूँ तो मालूम होता है जैसे सारी कायनात पर छा गया हूँ। यह तजुर्बा, ये अहसास मेरे वजूद का संगेबुनियाद है। मुझ पर रहम कीजिए उस्ताद।” उस्ताद की आवाज भर्रा गयी। बोले, “नामुराद, तूने अपने को बर्बाद कर डाला! अब ये औरतों की तरह रोता क्यों है! जा, साज ले आ.......!”

उस्ताद के कोई औलाद न थी। भतीजे थे, अपने-अपने काम में मशगूल। घरवाली अक्सर बीमार रहती थीं। घर का खर्चा बैंड पार्टी के सहारे किसी तरह चल ही निकलता। यों तो जलसे में जाने पर ही साजिन्दों को पैसे मिलते थे लेकिन मुझ पर उनका खास करम था। वे मुझे कुछ रुपये दरमाह देने लगे। मैं भी उनकी खिदमत में जी-जान से लगा रहता।

इसी बीच भाईजान की शादी की तारीख मुकर्रर हो गयी। मैंने अब्बा से कहकर बाजे के लिए मुन्ना बैंड को ही ठीक करा लिया और उस्ताद से माफी माँगी कि मैं भाई की शादी में बजा न पाऊँगा। उन्होंने बाजे को उठाकर मेरी कोहुनी पर दे मारा कि मैंने ऐसी बात कही ही क्यों। चोट से कोहुनी सूज गयी। अम्माँ उस पर जाने क्या-क्या लेप करती रही और मैं जाने उसे क्या-क्या सफाई देता रहा।

जरीना से भाईजान के निकाह के दौरान ही आँखें चार हुई थीं। वह भाभीजान की मामूजाद बहन थी। उससे नजरें मिलते ही दिल क्लाँट (क्लैरिनेट) बजाने को मचल उठा था। सारे वक्त ’मेरे महबूब’ का वह गाना मेरे अन्दर बजता रहा- “मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की कसम....” खुदा कसम, वैसी आँखें और चमकती पेशानी पर बिखरी जुल्फों की वैसी जादूगरी मेरी नजरों से फिर नहीं गुजरी। उन दिनों नकाब की वैसी अहमियत न रह गयी थी और बेनकाब औरतों को अब ताज्जुब से न देखा जाता था। मैं कितना खुशनसीब था जो मैंने उसे बिना परदे के देखा था और शायद उससे भी ज्यादा बदनसीब रहा होऊँगा।

उन दिनों मैंने एक से बढ़कर एक नयी धुनें बजायीं। कैसे-कैसे बचत करके एक सेकेंड हैंड ग्रामोफोन खरीदा। बिस्मिल्ला खाँ साहब, रफी साहब, लता जी और मुकेश साहब के रेकार्ड खरीदे और खूब बजाया। पहली बार जब मैंने क्लाँट पर ’दिल का खिलौना...’ बजाया तो उस्ताद वाह-वाह कह उठे और मुझे सीने से लगा लिया। मुन्ना बैंड की उन दिनों धूम मच गयी। लेकिन यह बात बहुत दिनों तक रही नहीं। अब्बा का दमे का मर्ज बढ़ता चला गया। वे बहुत कमजोर हो गये। कोई करने-धरनेवाला था नहीं। मेरी कमाई  का बड़ा हिस्सा डाॅक्टरों और दवाओं पर खर्च होने लगा। अब्बा बिस्तर पर पड़े-पड़े मुझे खर्च करते देखकर ताज्जुब करते लेकिन उन्हें इससे शायद बहुत इत्मीनान होता। शायद आखिरी वक्त में उन्हें यह गम नहीं रहा था कि मैं दो पैसे कमाने के काबिल नहीं रहा। आखिर अब्बा चले  गये। उनके जाने का गम अभी ताजा था कि भाईजान हमसे अलग हो गये। हमारा ढहता हुआ मकान कोठरियों में बँट गया। वे अलग भी ऐसे हुए कि फिर कभी लगा नहीं कि हम कभी साथ भी रहे थे। अम्मी मेरे साथ रहीं या कि मैंने जबरन उनको अपने साथ रखा। ये सब गम थे एक ओर, तो दूसरी ओर जरीना के हमसाया होने का अहसास मुझमें नयी जान फूँक देता जिन्दगी से जद्दोजहद के लिए।

उन दिनों मैंने कुछ शायरी भी की थी, सिर्फ जरीना की खातिर। एक बार जब जरीना अपनी बहन यानी भाभीजान से मिलने आयी तो मैंने दूसरों की नजरें बचाकर अपने कुछ कलाम उसकी हथेली पर रख दिये थे। बदले में मुस्कराकर उसने मुझे देखा था - जिन्दगी से लबरेज नजरें ! मैं बुत की तरह खड़ा रह गया था। फिर उसने दुपट्टा सर पर खींचकर आहिस्ता से कहा था, “जिन्दगी फकत शायरी से नहीं चलती हजूर!” मैं जाने कैसे अहसासों में जकड़ा हुआ था कि मुझसे कुछ कहा ही न गया। उसने फिर से मुझे मुस्कराकर देखा, सलाम किया और आगे बढ़ गई। मैं झट दो कदम आगे निकला और कह बैठा , " अल्लाह की फजल से अपने पैरों पर हूँ , बस आपका सहारा चाहिए !" उसने जरा रुककर एक तीरेनीमेकश मुझपर छोड़ा और मुस्कराती आगे बढ़ गयी। मुझे तो जैसे होश ही न रहा।

मैं इजहारे हाल कर बैठा था और अम्माँ को अपने दिल की बात कह दी। उन्होंने इस  इश्क के वजूद पर पहले तो शुबहा किया, फिर मान गयी। बात ज़रीना के घरवालों तक भी पहुँची। एक दिन मुझे खोजता हुआ उसका भाई बाजे की दुकान पर पहुँचा। मैं रियाज पर था, उसे खास पहचानता भी न था, सो उस पर तव्वजो नहीं दी। रियाज खत्म हुआ तो उस्ताद ने कहा, “देखो, ये तुमसे मिलने आये हैं।” मैंने खैरियत पूछी तो कहने लगा, “लाहौर विला कूवत... पठानों के खानदान के होकर इन बेहूदा बाजों में अपना वक्त जाया कर रहे हैं आप? लानत है!” मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन खुद पर काबू रखकर उसकी तारीफ पूछी, फिर चुप रह गया। पास की दुकान से  मुश्ताक को चाय ले आने को कहा।

”हुजूर, कोई और रोजगार तलाश करिए। हम अपने खानदान की लड़की का रिश्ता एक बाजेवाले के साथ हर्गिज नहीं कर सकते।”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया और उसे रुखसत किया। हमारे इश्क को ज़माने की नजर लग रही थी, यह बात मेरी समझ में आ गयी। मुझे लेकिन जरीना पर भरोसा था। मुझे लगता था वह मुझे ठुकरा न सकेगी। एक दिन मैं थका-माँदा घर पहुँचा तो अम्माँ ने ख़बर दी कि जरीना के घरवालों ने रिश्ते के लिए बाकायदा शर्त रख दी है कि मुझे बाजा छोड़कर दूसरे धन्धे में लगना होगा।

“तू किसलिए जिद किये बैठा है? तू यह सब छोड़ क्यों नहीं देता? चाहे तो अकलू (भाईजान) के साथ ही लग जा, मैं बात करती हूँ...।”

“क्या कहती हो अम्माँ! बाजे को छोड़ दूँ? कैसे छोड़ दूँ! अम्माँ, तुम समझती क्यों नहीं?”

“फिर समझा अपनी उस हूर-परी को,  और उसके घरवालों को। मैं समझ गयी, तेरा निकाह नहीं होगा। कहाँ से तू पैदा हुआ, ऐसा नासपीटा! किसी की बात नहीं सुनता।”

अब मेरे पास एक ही सूरत बची थी। किसी तरह जरीना से मिल सकूँ। मैंने भाभीजान से बहुत मिन्नतें की तो वे आखिरकार राजी हुईं। तय हुआ कि हम सुपर बाज़ारवाले हकीम के यहाँ दो घड़ी, सिर्फ दो घड़ी के लिए मिल सकते हैं। वह भी ऐसे कि वह बात और लोगों पर जाहिर न होने पाए।

जरीना परेशान दिखती थी, संजीदा। लेकिन मुझे हल्के-से सलाम करना न भूली और दीवार से सटकर खड़ी हो गयी। मैं उसकी बगल में खड़ा हो गया। मेरी नजरें उसी पर जमी हुई थीं, लेकिन वह मुझे नहीं देख रही थी। वह कभी वहाँ जमा मरीजों को तो कभी सड़क पर जाती सवारियों को देख लेती थी।

“क्या आप भी वही कहती  हैं जो आपके घरवाले फरमाते है? ‘‘मैंने आहिस्ता से पूछा। दिल अन्दर ड्रम की तरह बजने लगा। वह चुप रही, उसने कुछ नहीं कहा।

“मैं मामूली-सी चीज हूँ लेकिन आपको पलकों पर बिठाकर रखूँगा। देखिए मैं तो आपको शरीके हयात मान चुका हूँ...। ”

“आपको मुझसे मोहब्बत नहीं!” वह बहुत धीमे से बोली।

“क्या सुबूत दूँ जो आपको यकीन आए?”

“बाजा छोड़ दीजिए!” उसने निगाहें उठाकर मुझे देखा, मुस्करायी। मैं एकदम अन्दर तक बुझ गया। मेरे अन्दर के गोया सारे साज बेसुरे हो गये। मैंने उसे सलाम किया और थके-थके कदमों लौट आया।

दुकान पर आया। क्लाँट उठाया। बहुत देर तक उसमें सुर फूँकता रहा। आखिर में धुन निकली, “गुजरे  हैं  आज इश्क में हम उस मुकाम से, नफरत-सी हो गयी है मुहब्बत के नाम से... ”

गना खत्म हुआ तो उस्ताद ने मेरे कन्धे पर हाथ रखा। मैं अपने को जब्त न कर सका, कहा, “उस्ताद सच, मैं दोनों जहाँ से गया!”

अजीज मियाँ सहसा एकदम खाखामो हो गये। उनकी चुप्पी ने जैसे मेरे ख्यालों को भी ब्रेक लगाया।

“ठहरिए, मैं आपके लिए खाना ले आता हूँ।”

“नहीं-नहीं बाबू, रहने दो, मैं खुद ले लूँगा।”

“नहीं, आप बैठिए।”

मैं झट दो प्लेटें सजा लाया। एक उन्हें पकड़ायी और एक मैंने खुद ली। मेरे पूछने और आग्रह करने के बावजूद उन्होंने दोबारा कुछ  नहीं लिया। और मैं भी अपने हाजमे की परेशानी की वजह से इस तरह के आयोजनों में कम से कम खाता हूँ। खाना हमने जल्द ही खत्म कर लिया। वे खा चुकने के पपश्चात अपने शागिर्दों को तलाश रहे थे कि मैंने कहा-

“अजीज मियाँ, थोड़ी देर रुके रहिए। इतने दिनों बाद मिले हैं, फिर जाने कब मुलाकात हो।” वे मान गये, गो कि दस बजे रहे थे। अब तक अतिथिगण जा चुके थे। बाराती भी जनवासे लौटने की तैयारी में  दिखते थे।

“तो क्या उसके बाद आपने शादी का ख्याल ही छोड़ दिया?”

“हाँ! लेकिन एक मौका फिर आया था जिन्दगी में!”

“अच्छा? वो कैसे?”

अजीज मियाँ ने जेब से एक डिबिया निकाली। उसमें से बीड़ी निकालकर होठों से लगा लिया। मैंने आस-पास देखा। पास ही एक लड़का ट्रे में पान-सिगरेट लिये खड़ा था। मैंने कहा, आप सिगरेट पीजिए, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। उन्होंने बीड़ी सुलगा ली-

उस्ताद अब कमजोर हो गये थे। वे अक्सर बीमार रहने लगे। पार्टी के साथ जाना तो उन्होंने छोड़ दिया था। अब बैंड पार्टी उन्होंने पूरी तरह मेरे जिम्मे कर दी थी। मुझे अब ज्यादा काम करना पड़ता। उधर अम्माँ के साथ भी कुछ न कुछ लगा ही रहता। मुझपर बहुत जिम्मेदारियाँ आ गयीं। तभी एक दिन खाला (उस्ताद की घरवाली को हम खाला कहकर पुकारते थे) की तबीयत ऐसी बिगड़ी कि लाख कोशिशों के बावजूद वे बच न सकीं। उस्ताद अब ढल-से गये। उनके बाल पके तो थे ही, अब पीले पड़ने लगे थे। उन्होंने हजामत करना भी लगभग छोड़ ही दिया था। चेहरे का नूर जाता रहा। मैं भरसक उन्हें अकेले न रहने देता, दुकान में ही बिठाये रखता। वे भी मेरा बहुत ख्याल रखते और दूसरे शागिर्दों का भी ख्याल रखने को कहते।

एक दिन मैं बाहर से दुकान लौटा तो देखा उस्ताद अकेले बैठे बाजा बजा रहे हैं। तेज गर्मी पड़ रही थी। आँखें बन्द, चेहरे पर पसीना छलछलाता हुआ, “ओ दूर के मुसाफिर! हमको भी साथ ले-ले रे, हमको भी साथ ले-ले, हम रह गये अकेले...” मैं फर्श पर ही बैठ गया और चुपचाप सुनता रहा। अन्दर कहीं वीरानी-सी छाने लगी कि उन्होंने बजाना खत्म किया, जोर से गला साफ करके बाहर थूक फेंका। मुझे देखा। उनकी आँखें एकदम लाल थीं, और आँखों के ऊपर-नीचे गुटके से उभर गये थे। उन्हें देखकर डर-सा लगा।

“आ गया तू! बता, क्या मिला तुझे इन बाजों में साँस फूँककर?” मुझे लगा कि वे मुझसे नहीं अपने आप से कह रहे हैं। मेरा दिल रोने को हो आया। लेकिन वे मुझी से कह रहे थे।

“खैर, खुदा तेरी लगन का सिला जरूर देगा। तू जितना अच्छा शागिर्द है, अब उतना ही अच्छा उस्ताद बनकर दिखा। वो पेटी यहाँ ले आ।”

मैं पेटी उठा लाया। टिन की पुरानी जंग खायी पेटी थी जिस पर छोटा-सा ताला जड़ा था। उन्होंने कुर्ते के अन्दर की जेब से चाबी निकाली, ताला खोला और मुड़ा हुआ एक कागज मेरी ओर बढ़ाया।

“ये क्या है उस्ताद?”

“मेरे पास है ही क्या बेटा। जितना सीखा था तुझे सिखा दिया। अब बस यह दुकान और पीछे की पाँच धुर जमीन बची है। अब तू ही सँभाल। मैंने तेरे नाम कर दिया है। इन कागजात को सँभाल कर रख।”

मैंने कागज खोलकर देखा। अँग्रजी की इबारत के नीचे कुछ दस्तखत और कचहरी की मुहरें थीं। उस्ताद  का दस्तखत मैं साफ देख सकता था। वह सब कुछ ठीक-ठीक मेरी समझ में नहीं आया। शायद इसलिए कि मैं सपने में भी इस बात का गुमान नहीं कर सकता था।

“मैं इस काबिल नहीं उस्ताद! मुझे बस अपने सर पर आपका साया चाहिए। मुझे और कुछ नहीं चाहिए। खुदा आपको उम्रदराज करे। आप सौ साल जीएँ!” बोलते हुए मेरी आवाज काँप गयी।

“अरे, तू इतना जज्बाती क्यूँ हो रहा है? मैं अभी कोई जा थोड़े ही रहा हूँ। ये कागज बहुत सँभाल कर रखना। दुनिया बहुत बुरी है।” उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरा। मैंने वह कागजात उनसे ले लिये और उन्हें अपने घर में हिफाजत से रख दिया। अम्माँ को इस बाबत बताया तो पहली बार उसके मुँह से उस्ताद के लिए दुआ निकली।

जरीना का निकाह मेरे ही अपने चचाजाद भाई से हुआ। गनीमत थी कि वह दूसरे शहर में रहता था। जरी का उसका अच्छा कारोबार था। लेकिन जरीना पर उस वक्त मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा जब फसाद में उसके शौहर की दुकान जलकर खाक हो गयी। उसे खुद भी गहरी चोटें आयीं, किसी तरह जान बची। उन्हें सँभलने में बहुत वक्त लगा, यों कहें कि पहले वाली हालत फिर कभी बहाल नहीं हुई। इधर भी फिजाँ बिगड़ी हुई थी। जान आफत में थी। हमारी दुकान पर भी पत्थर बरसे, गनीमत थी बात आगे नहीं बढ़ी।

“एक लड़की ने बेवफाई क्या कर दी, तूने अपनी सारी जिन्दगी ही उसके गम में गुजार देने की कसम खा ली है। इससे क्या मिलेगा तुझे मझलू ? क्यों तू नाहक खुद को गला रहा है! ये दुनिया ऐसे ही चलती है। इसके लिए क्या कोई अपने को गम के समन्दर में डुबो दे? मैंने तेरे लिए लड़की देख रखी है। तुझे मेरी कसम जो तूने ना की। बोल, मैं बात बढ़ाऊँ न?” हम सोने की तैयारी कर रहे थे कि अम्माँ ने मुझसे पूछा।

“आधी से ज्यादा उमर तो गुजर गयी अम्मी, बाकी भी गुजर जाएगी। तुम क्यों परेशान होती हो ? ”

“अरे अहमक, कल किसने देखा है। अपनी मिट्टी का क्या अंजाम होता है, कौन जानता है। तू आखिर क्यों जिद में पड़ा है ? देखना तेरी तकदीर बदल जाएगी। इस मनहूस घर में अब एक पल भी नहीं रहा जाता है।”

“अच्छा अम्माँ, जैसा जी में आये करो। बस मुझसे कुछ न पूछो। ”मैंने जबाव दिया और करवट बदलकर सो गया। जोहरा बानो दूर के रिश्ते में अम्माँ की भतीती लगती थी। वह बहुत छोटी थी कि वालिद खत्म हो गये। बहुत ही हैबतनाक फसाद फैला था। जोहरा दादा के इन्तकाल के बाद अपने चाचा के घर एक नौकरानी बनकर रह गयी। अम्माँ कहती थी, वह खूबसूरत थी लेकिन उस बेचारी ने जिन्दगी का बेहतरीन वक्त बेगारी और जिल्लत में गवाँ दिया। अब उसकी शादी की उम्र पार कर रही थी। जाने कैसे उसके चाचा को उस पर रहम आ गया था और वे किसी भी तरह जल्द से जल्द  उसका निकाह कर देना चाहते थे।

मैंने अम्माँ को कहा कि लड़कीवालों को मेरे धन्धे व शौक के बारे में बिल्कुल साफ-साफ पता हो जाना चाहिए, इसके बाद ही बात आगे बढ़नी चाहिए। अम्माँ ने बताया कि उन्हें सब कुछ मालूम है और वे तैयार बैठे हैं। मैं फिर क्या कहता। अम्माँ तो मारे खुशी के रो पड़ी। उस्ताद को मैंने जब इस बारे में इशारा किया तो वे भी बड़े खुश हुए। कहने लगे कि वे खुद मेरी बारात सजाएँगे। शागिर्दों को कहा कि वे बाजों को खूब साफ-सुथरा करके चमकाएँ। कपड़े और जूते भी और हैट भी बिल्कुल एक नम्बर दिखना चाहिए। मैं भी यह सब देखकर फूला न समाया और खुदा की इनायत पर उसका दिल ही दिल में शुक्रिया अदा किया। जिस टेलरिंग की दुकान में मैं काम करता था, वहाँ नसीम कुर्ते का बहुत अच्छा काम किया करता था। उसे रेशमी कुर्ता और शेरवानी के लिए कपड़े दे आया।

ऊपरवाला मगर कुछ और चाहता था। उस साल बहुत जबरदस्त लगन था। हमें दम मारने की फुर्सत न थी। तारीख न मिलने से कितने आसामी दुकान से लौट गये थे। कुछ बहुत खास लोग नाराज भी हो  गये क्योंकि हमारे पास उनकी बारात  सजाने के लिए बिलकुल वक्त न था. एक बड़े आसामी थे .उनके यहाँ बारात  सजानी थी। उनकी ख्वाहिश  थी कि उनके बेटे की बारात में उस्ताद बैंड पार्टी के साथ खुद मौजूद रहें। उस्ताद ने कहीं आना-जाना छोड़ दिया था। मगर पुरानी वजादारी थी, सो उनकी बात भी नहीं उठा पा रहे थे। हमने बहुत समझाया, टूटे हुए दाँतों का भी वास्ता दिया। वे माने नहीं। कहने लगे, सारा बदन जाम पड़ गया है, गले से जैसे हवा नहीं खींची जाती, जाऊँगा तो वर्जिश  हो जाएगी। तुम लोग परेशान मत होवो। इसके बाद हम क्या कह सकते थे।

उस्ताद लगता था कि फिर से जवान हो गये थे। क्या धुनें उठायी थीं उन्होंने। मैं भी उनके साथ पूरे जोश में था। हमने खूब वाहवाही लूटी। उस्ताद ने उस दिन कुछ अँग्रेजी धुनें भी बजायीं जो कभी अँग्रेज बजवाया करते थे। उस्ताद की और मेरी भी कमीज पर नोटों के बंडल टाँक दिये गये।

हम सभी खुश-खुश लौटे। उस्ताद ने बख्शीश  में मिले नोटों का हिसाब किया और सबको विदा कर दिया। मुझे उन्होंने अगले दिन जरा सुबह आने को कहा। सुबह सात बजे के करीब जो मैं उनके पास पहुँचा तो देखा वे बेहोश पड़े थे। मैं डाॅक्टर ले आया, साथियों को ख़बर भिजवायी। डाॅक्टर ने फौरन अस्पताल ले जाने को कहा। अस्पताल में वे तीन दिन रहे। डाॅक्टर कहते थे, फेफड़े ठीक तरह से काम नहीं कर रहे। हमने बहुत मन्नतें माँगी, दरगाह पर चादर चढ़ाई, मन्दिरों में चढ़ावा दिया, लेकिन उस्ताद उठे नहीं। चौथे दिन उनकी मंजिल उठी अस्पताल से। हमने उनकी शान में मातमी धुनें बजायीं।

मुझे अब मुन्ना बैंड को किसी तरह बचाना था, या कहूँ कि उसकी शान में और इजाफा करना था। कुछ अपने साथी ही गद्दारी पर उतर आये मगर खुदा ने मेरी इज्जत रख ली। मैं अब पूरा वक्त बाजा पार्टी को देने लगा। कुछ नये शागिर्द बहाल किये, उन्हें सिखाया। तभी कुछ सालों बाद बैंड पार्टी में गवैयों का चलन चल निकला। मुझ पर बहुत जोर पड़ा मगर मुझे यह किसी भी तरह बर्दाश्त हीं था। कहाँ के गवैये ठहरे ये लौंडे, जो एक ही साथ कभी रफी साहब तो कभी लताजी की आवाज उतारते हैं? और बैंड पार्टी जैसे उनके रहमो करम पर जीती हर हाल में साथ देती रहती है। इसमें थोड़ा घाटा भी हुआ। जमाने के हिसाब से हम थोड़ा पिछड़ गये लेकिन हम इसी में खुश  हैं। अब भी मौका मिलता है तो पुरानी धुनें उठा ही लेते हैं। मगर वे तो बाद की बातें हैं।

उस्ताद के आने के बाद सदमे से बाहर निकलने में काफी वक्त लगा। अम्माँ मुझे बहलाये रखने की कोशिश करती। कोई दो महीने बाद उसने मुझ जोहरा बानो की याद दिलायी। अब बेकार में लड़कीवालों को लटकाये रखने से क्या फायदा था। मैंने अम्माँ को कह दिया कि वह तैयारी कर ले। इस बात को हफ्ता भर बीता होगा। मैं रात को खाना खाने बैठा था। अम्मा रोटी सेंक रही थी।

“तुझे एक बात कहनी है मझलू...” अम्माँ ने कहा।

“क्या?”

“खा ले तो कहती हूँ!”

“ऐसी कौन-सी बात है?”

“है, पहले तू खा ले।”

मैंने भी जिद नहीं की। खूब आराम से खाया और बिस्तर पर आ गया। अम्माँ भी थोड़ी ही देर बाद बगल की खाट पर बैठी।

“तुम कुछ कह रही थी अम्माँ?”

“वो जोहरा...”

“हाँ-हाँ, जोहरा बानो को क्या हुआ?”

“नसीबन के यहाँ गयी थी। कह रही थी जोहरा गायब है।”

“गायब है?” मैं चैंककर उठ बैठा।

“कह रही थी दो दिनों से उसका कोई अता-पता नहीं।”

“क्या कहती हो अम्माँ?”

“कैसी खोटी किस्मत है तेरी रे मझलुआ...” अम्माँ यकायक सुर में रोने लगीं। मैंने खुदा को याद किया और जोहरा की सलामती की दुआ की। अम्माँ को चुप कराने में काफी वक्त लगा। उस पूरी रात हम सो न सके। हल्की ठंड शुरू हो रही थी। मुहल्लों में दुर्गा-पूजा की तैयारियाँ चल रही थीं। कहीं-कहीं से लाउडस्पीकर पर कुछ-कुछ आवाजें सुनाई पड़ती थीं।

उस रात साज मेरे पास था। आले पर क्लाँट रखा था, दो महीने पहले नया बाजा खरीदा था। मगर सुर जैसे मेरे पास नहीं था, मेरे अन्दर नहीं था, मुझमें से निकलकर बहुत दूर, कहीं सितारों के झुरमुट में खो गया था। मैं था बिल्कुल खाली...।

तब से मैंने कितनी शादियाँ करायीं कितनों की बारात सजायी मगर खुद उस ख्याल तक से तौबा कर लिया। आखिर दिल दिल है, कोई बाजा तो नहीं ! खुदा ने इसलिए मुझे दुनिया में भेजा कि मैं बाजा बजाऊँ, तो मरते दम तक बाजा बजाऊँगा। एक सुर खो गया, दूसरा तलाश लूँगा। एक धुन फीकी पड़ी, दूसरी बना लूँगा। मैं सोचता हूँ काश मैं बड़े गुलाम अली खाँ साहब या फिर बिस्मिल्ला खाँ साहब या नौशाद साहब का ही शागिर्द होता! मगर हमारे उस्ताद ही क्या किसी से कम थे! जैसा अल्लाह ने चाहा होगा वैसा हुआ। मैं बस इस मुर्दा बाजे में साँस फूँकने के लिए जिन्दा हूँ, भले मैं इसमें दोनों जहाँ से जाऊँ।

उनकी आवाज बहुत भारी हो गयी थी। बीच-बीच में वे गला ठीक कर लेते थे। उनके शागिर्द आकर हमारे पास खड़े हो गये थे। अपने-अपने साज़ के साथ, घेरा बनाकर।

“चलो बच्चो! अच्छा सूरजबाबू...” अजीज मियाँ ने पहले शागिर्दों को फिर मुझे देखा। तब तक पत्नी बच्चे को लिये मुझे खोजती वहाँ पहुँच गयी। अभी कुछ कहती कि मैंने चुप रहने का इशारा किया।

“इन्हें नमस्ते करो!...” मैंने कहा तो पत्नी ने सकुचाते हुए अजीज मियाँ को नमस्ते किया। अजीज मियाँ ने हाथ का क्लैरिनेट उठाकर जैसे आशिष दिया। मैंने अपनी गोद में बच्चे को ले लिया, वह सो रहा था और अजीज मियाँ की गोद में डाल दिया।

“यही है हमारा बच्चा। इसे ... आशीर्वाद दीजिए।”

अजीज मियाँ बहुत भावुक हो गये। उन्होंने हाथ का बाजा शागिर्द को पकड़ाया। बच्चे को गोद में लेकर उन्होंने जाने क्या मन्त्र पढ़ा और बच्चे के माथे पर और चेहरे पर फूँक मारी। मुझे पकड़ाया और आँखें पोंछते खड़े हो गये। मैंने उन्हें नमस्ते किया। उन्होंने मेरे हाथ अपने हाथों में ले लिये, कहा, “जीते रहो, फूलो-फूलो! तुमने हमें याद रखा, ये कर्ज हम कैसे उतार पाएँगे...” जाने क्यों मेरा भी मन भर आया, कुछ कह न सका। अजीज मियाँ आखिर अपने आदमियों के साथ चले गये।

“पंख होते तो उड़ आती रे...”, जैसे इस धरती से लेकर आकाशगंगा तक यह धुन अनुगूँजित हो रही थी और मैं जैसे नक्षत्रों की यात्रा कर रहा था। स्कूटर जब अपने मकान के फाटक पर रुका तो पत्नी ने पूछा-

“ये कौन थे जी जिन्होंने इतनी फूँकें मारीं बच्चे को?”

“ये अजीज मियाँ थे, मुन्ना बैंडवाले उस्ताद!” मैंने कहा और दरवाजे पर जड़ा ताला खोलने लगा।

( वागर्थ, जुलाई 2001 में प्रकाशित।)

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Friday, 3 March 2023

 रेणु जयंती 

एक आदिम रात्रि की महक ...

जीवन में नयी अर्थवत्ता की खोज


                                   - शिवदयाल

    रेणु की मौलिकता की खूब चर्चा होती है। उनकी मौलिकता की थाह लेने के लिए शायद उन्हें कभी प्रेमचंद तो कभी बांग्ला कथा-परम्परा से जोड़ने की कोशिश की जाती है, और इस पर विवाद भी खूब होता रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि रेणु पर दोनों ही प्रभाव हो सकते हैं, तब भी उन्हें किसी एक परम्परा की उपज बताना उनके साथ ज्यादती होगी। वास्तव में उनकी मौलिकता ही ऐसे प्रयासों के आड़े आती है। अगर यथार्थवाद की कसौटी पर उन्हें प्रेमचंद का उत्तराधिकारी माना जाता है, तो वे प्रेमचंद के मुकाबले अधिक, बल्कि अतिशय यथार्थवादी हैं। प्रेमचंद के यहाँ यदि यथार्थ का 'बेस स्ट्रक्चर' है तो रेणु के यहाँ उसका 'सुपर स्ट्रक्चर' भी मौजूद है। रेणु का पात्र केवल अपने परिवेश और परिस्थितियों के साथ ही नहीं, बल्कि अपनी मूल वृत्तियों, स्वभावगत विशेषताओं और ऐन्द्रिक संवेगों के साथ उपस्थित है। रेणु के पहले कम से कम हिन्दी कहानी में रूप, रस, गंध और ध्वनि की मौजूदगी एक साथ नहीं देखी गई। रेणु के यहाँ कुछ भी सपाट नहीं, भंगिमाविहीन नहीं। अभिधा भी व्यंजना के रस में डूबी उपस्थित होती है, या यों कहें कि दोनों का फर्क मिट जाता है। इन्हीं अर्थों में रेणु हिन्दी के अत्यन्त मौलिक कथाकार हैं। वैसे वे अवस्थिति और भाषा के लिहाज से भी हिन्दी के अपूर्व कथाकार तो हैं ही। वे अपने पात्रों को जमीन से जस का तस उठाते हैं उनकी कमियों और खूबियों के साथ, और मनकों की तरह कथा में पिरो देते हैं - अपने समय के सच को उद्घाटित करने के लिए। इसके लिए वे जिस भाषा को काम में लाते हैं वह उस अवस्थिति का पता देती है जहाँ घटनाएँ घट रही हैं। वे भाषा को मानकता की कसौटी पर कसना जरूरी नहीं समझते, बल्कि उसे और समृद्ध करते जाते हैं, प्रसार करते जाते हैं, - हिन्दी मानो ‘खरी’, ‘खड़ी’ न रहकर थोड़ी ‘नय’ जाती है, विनम्र और ग्रहणशील हो जाती है। उनकी कहानियों में कोसी अंचल मानो स्वयं बोलने लगता है, अपने को परत-दर-परत खोलने लगता है।रेणु सूक्ष्म (माइक्रो) स्तर पर जीवन-व्यापार देखते हैं। यह उनका देखा-भाला ही नहीं, ‘छाना’ हुआ इलाका है।

    ‘आदिम रात्रि की महक’ गंध-संवेदना की संभवतः एकमात्र कहानी है। इसका पूरा कथानक गंध में लिपटा है। तरह-तरह की गंध स्मृति से लेकर वर्तमान तक पसरी हुई है। इन्हीं में, इन्हीं से चीजें पहचान पा रही हैं। किसी खास गंध में स्मृति कौंधती है, तो किसी में अरमान भी जगते हैं। कहते ही हैं कि हर व्यक्ति की अपनी एक गंध होती है - देह गंध, लेकिन इसे जानने के लिए अतिशय संवेदनशीलता की जरूरत होती है। कहानी के प्रमुख पात्र करमा, उर्फ करमचन में एक महक है मछली की, उसका साहब बताता है। डोमपट्टी की किशोरवय लड़की में भी बिन नहाए देह की एक अजीब-सी गंध थी, जिसे करमा कभी प्यार से हलवा-पूरी खिलाना चाहता था। इस कहानी में तो कुत्ता भी कुछ-कुछ सूँघ रहा है। एक रात चूना-वार्निश के गंध से कहानी शुरू होती है और एक सुबह जब समाप्त होती है, तब करमा गंध के सागर में डूबा हुआ है।

    कहानी कटिहार-मनिहारी घाट रेल सेक्शन के एक स्टेशन आदमपुर के नये बने भवन से शुरू होती है जबकि चूने और वार्निश की गंध करमा को सोने नहीं देती, उसकी कनपटी में 'चवन्नी-भर दर्द’ चिनचिनाता रहता है। करमा 'रिलिफिया' बाबुओं के साथ पिछले बारह वर्षों से रहता चला आ रहा है। वह न रेलवे का कर्मचारी है न इन बाबुओं का नौकर। वह उनके साथ रहता है, उनकी सेवा करता है और बदले में कोई पगार या ‘मुसहरा’ नहीं लेता, इसलिए वह कहता है - हम बाबू के साथ रहते हैं, यह नहीं कहता कि उनका नौकर है, और यही सच है। ‘‘एक पैसा भी मुसहरा न लेने वालों को नौकर’ तो नहीं कह सकते!’’ वह 'पेट-माधोराम मर्द’ है। पेट भर भात पर अपनी सेवाएँ देता है।

    ‘करमा’ नाम भी एक रिलिफिया बाबू का दिया हुआ है - गोपाल बाबू का। आसाम से लौटती हुई कुली-गाड़ी में एक ‘डोको’ के अंदर पड़ा यह जीव मिला, बिना 'बिलटी-रसीद’ के ही - लावारिस माल, एक अज्ञात-कुलशील बालक जिसका नामकरण उन्होंने किया - करमा। उन्होंने उसे साथ रखा पूरे पाँच साल। यह करमा जिसे बाद में अलग-अलग बाबुओं ने अलग-अलग नाम से पुकारा, दरअसल गोपाल बाबू की ही खोज या आविष्कार है। तब से बारह सालों में एक दिन के लिए करमा रेल की पटरी से अलग नहीं हुआ। ‘रिलिफिया’ बाबू को छोड़कर किसी ‘सालटन बाबू’ के साथ वह कभी नहीं रहा। सालटन बाबू का मतलब किसी टिसन’ पर ‘परमानंटी’ नौकरी करने वाला, फैमिली के साथ रहने वाला। रेणु ने यह एक विचित्र चरित्र खड़ा किया है करमा का जिसके एक तो कुल-गोत्र का कुछ पता नहीं, जो एक कुली गाड़ी के ‘डोको’ में पड़ा मिलता है, रिलिफिया बाबुओं के साथ रहकर पलता-बढ़ता और पोसाता है जो वास्तव में रेलवे के स्थानापन्न अस्थायी कर्मचारी हैं जिन्हें छुट्टी या अन्य कारणों से अस्थायी रूप से कुछ दिनों के लिए खाली पदों पर काम करने के लिए एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन भेजा जाता है। दूसरी बात कि मौका मिलने पर भी वह रेलवे की इंजन टँकी नीली कमीज पहनने को तैयार नहीं होता, यानी पोटर, खलासी, 'पैटमान' या पानी-पाँड़े की स्थायी नौकरी नहीं करता। तीसरी बात कि वह बाबुओं से भी एक पैसा पगार नहीं लेता, उनका ‘नौकर’ नहीं बनता। दो पटरियों के बीच सिमटे इस जीवनक्रम को वह जहाँ-तहाँ खींचकर विस्तारित भी करता है - वह खुली आँखों से जिज्ञासा के साथ जगत व्यापार देखता है। रेलवे के बाहर के चरित्र भी उसके जीवन में दाखिले होते हैं - अलग-अलग स्थानों के, जिन्हें वह याद करता रहता है - प्रायः अलग-अलग गंधों से - चाहे वह मनिहारी घाट के कुली-कुल के मस्तान बाबा हों या वारिसगंज टिसन के निकट तंबुओं में रहनेवाले डोमपट्टी के मगहिया डोम की छौंड़ी (लड़की)। वह निर्जन लखपतिया टिसन के पास पोखरों में घंटों गले तक डूबकर स्नान-सुख लेता है, कदमपुरा में कदम (कदम्ब) के हजारों पेड़ हैं - उनकी चटनी चखता है। उसे ‘कितनी जगहों, कितने लोगों की याद आती है’ - बथनाह टिसन का सूनापन, सोनबरसा के आम, कालूचक की मछलियाँ, महोदर का दही...। तरह-तरह की ध्वनियाँ भी उसका पीछा करती रहती हैं जिसपर आगे चर्चा होगी।

    नई जगह, नये टिसन में पहुँचकर आस-पास के गाँवों का एकाध चक्कर लगाए बिना उसे चैन नहीं आता। यहाँ आमदपुर में भी ‘डिसटन सिंगल’ के उस पार दूर-दूर तक फैले खेत, ताड़ का अकेला पेड़ और काला जंगल मानो उसे आमंत्रित कर रहे हैं। वह बाबू को भोजन कराकर उस ओर निकल पड़ता है। गाँव के सिवान पर उसे वह बूढ़ा मिलता है जो स्टेशन पर पंद्रह बोरे बैंगन बुक कराने आया था और बदले में पंद्रह नग बैंगन कर्मचारियों को बख्शीश दी। बूढ़े ने उससे खूब कुल-गोत्र, पता-ठिकाना पूछा था और हर सवाल पर करमा ने आसमान की ओर अंगुली उठा दी थी - मस्तान बाबा की तरह। बूढ़ा उसे घर ले जाता है, आज भी उससे कई सवाल करता है, उसके गमछे में बँधी अभी-अभी पकड़ी गई मांगुर मछलियों के बारे में भी। खासकर वह उसकी कमाई और पगार के बारे में पूछता है और सब जानकर हँसकर यह विशेषण देता है - ‘पेट-माधोराम मर्द!’ पेट भात पर खटने वाला आदमी। और हाँ, ‘बूढ़ा ठीक साहू बाबू टीटी के बाप की तरह हँसता है।’ यह करमा उर्फ करमचन को हमेशा के लिए बदल देनेवाली घटना है जो रेल पटरियों के बाहर घट रही है।

    जब बूढ़ा उससे पूछता है - ‘मछली है? बाबू के लिए ले जाओगे?' तो करमा जवाब देता है - ‘नहीं। ऐसे ही .... रास्ते में शिकार .....।’ इस पर बूढ़ा आवाज देता है - ‘सरसतिया की माय! मेहमान को चूड़ा भूनकर मछली की भाजी के साथ खिलाओ....’ फिर करमा को कहता है, किंचित व्यंग्य में - ‘एक दिन दूसरे के हाथ की बनाई मछली खा लो जी!’ इस घर का करमा पर उपकार अभी समाप्त नहीं होता, अभी तो उसे तारने वाला प्रसाद बाकी है। जलपान करते करमा सुनता है, सरसतिया की माँ से कोई औरत सवाल करती है -

‘कहाँ का मेहमान है?’

‘कटिहार का।’

‘कौन है?’

‘कुटुम ही है।’

‘कटिहार में तुम्हारा कुटुम कब से रहने लगा?’

‘हाल से ही।’

    ‘कुटुम!’ अनाथ, निराश्रित, पेट भर भात पर जीवन चलाने वाले करमचन के लिए मानो जनमों के संचित पुण्यों का फल है यह शब्द! जीवन में पहली बार एक औरत के मुख से उसके लिए निकला शब्द! उसे तो ‘जनाना’ शब्द से ही नफरत-सी हो गई थी - वह सच्छात राक्षसी गोपाल बाबू की ‘बौमा’ (बहू माँ) जो उन जैसे सीधे-सरल आदमी को हाड़-गोड़ सहित चबाकर खा गई! लेकिन यहाँ तो नेह का, ममता का अमरित बरस रहा है, हाल ही में पुत्र-शोक से उबरी, या कि अब तक उसमें डूबी सरसतिया के माय के मुख से - ‘एक दिन फिर आना’; ‘अपना ही घर समझना!’ हाँ, सरसतिया जब चिलम फूँकती है तो उसके गाल मोसम्बी की तरह गोल हो जाते हैं!

    लौटते समय करमा को लगता है, जैसे तीन जोड़ी आँखें उसकी पीठ पर लगी हैं - डिसटन सिंगल, होम सिंगल और पैट सिंगल की लाल-लाल रोशनी। कथाकार यहाँ ठहराव का इशारा कर रहा है। आखिर पंद्रह दिन बीत जाते हैं। रात की गाड़ी से टिसन से साल्टन-मास्टर बाबू आए हैं - बाल बच्चों के साथ। भोर की गाड़ी से करमा को अपने बाबू के साथ हेड क्वाटर लौट जाना है। कल सुबह जाना है। करमा को नींद नहीं आ रही। गोपाल बाबू जैसे बाबू मजे में सो रहे हैं - ‘न किसी की जगह से तिल-भर मोह, न रत्ती-भर माया।’ करमा भी इन पड़ावों के प्रति यही भाव रखता आया है। लेकिन आज वह यह किन बंधनों में जकड़ रहा है - ‘एक दिन फिर आना’, ‘अपना ही घर समझना’, ‘कुटुम?'!

    अचानक करमा को एक अजीब गंध लगती है, शायद स्वप्न में ही। वह गंध का पीछा करते ज्यों ही रेलवे लाइन पर पैर रखता है अचानक सभी सिंगल (सिगनल) जोर-जोर से बिगुल फूँकने लगते हैं, मानो उसे सावधान करते हैं। फैमिली क्वाटर से गोपाल बाबू की बौमा चिल्लाती है - ‘चो-ओ-ओ-र.’! सपने में ही एक इंजिन उसके पीछे दौड़ा आ रहा है। मगहिया डोम की छौंड़ी को देख वह तंबु में छिप जाता है। अब यहाँ सपने में वारिसगंज की छौंड़ी और खिलखिलाती हुई सरसतिया मिलकर एक हो जाती है, वरना सरसतिया में करमा को बेनहाई देह की गंध कैसे मिल सकती है? करमा डर जाता है। ‘डरकर सरसतिया की गोद में .... नहीं, उसकी बूढ़ी माँ की गोद में अपना मुँह छिपा लेता है। रेल और जहाज के भोंपे एक साथ बजते हैं। सिंगल की लाल-लाल रोशनी ....!’ यानी रुकने का संकेत! करमा मातृविहीन ही नहीं, स्त्रीविहीन व्यक्ति है, उसके जीवन में कोई स्त्री नहीं है, कुछ स्मृतियाँ हैं जिनका कोई खास मतलब नहीं। करमा सपने में सरसतिया की बूढ़ी माय की गोदी में शरण पाता है। यही स्वप्न उसका भवितव्य है। कथाकार ने यहाँ स्त्रीत्व के मातृपक्ष को वरीयता दी है, मूल्य और मान दिया है। आखिर तो मातृ-संसर्ग, उसका स्पर्श और उसकी छाया जीवन का पहला बोध है, भले ही वह करमचन के जीवन में देर से आया हो! सुबह होती है और बाबू उसे उठाते हैं तो ‘करमा एक गंध के समुद्र में डूबा हुआ है...’ यह कैसी गंध है? अजीब-सी गंध..! कहीं यह ममता की गंध ही तो नहीं जो बारह सालों से इस रेल सेक्शन पर रिलिफिया बाबुओं के साथ रहते, खाते-पीते, उनकी झिड़कियाँ और खर्राटे सुनते असल -‘पेट-माधोराम’ करमचन उर्फ करमा को उस चूने और वार्निश की गंध वाले आदमपुर टिसन पर रोक लेती है! वह बाबू के सामान डिब्बे में चढ़ाता है लेकिन ऐन वक्त कहता है - बाबू? ... मैं नहीं जाऊँगा!’’ वह चलती ट्रेन से उतर जाता है, उसे ठोकर लगती है लेकिन संभल जाता है। प्लेटफार्म पर उसे गाड़ी में चढ़ा देख कूँ-कूँ करते बेचैन कुत्ते को भी चैन मिला (होगा!)।

    तो यह कहानी है ‘आदिम रात्रि की महक...।’’ लेकिन कुछ और प्रसंगों पर भी थोड़ी चर्चा होनी चाहिए। कहानी में करमा अपने चटाई लपेटू तदर्थवादी जीवन से अलग हो भूलकर भी स्थिरता की ओर नहीं जाना चाहता; वह ‘साल्टन’ नहीं बनना चाहता। यह अस्वाभाविकता उसमें एक भय से उपजी है। उसे नाम-पहचान, नेम-छोह देने वाले पिता तुल्य गोपाल बाबू जब तक रिलिफिया बाबू बने रहते हैं, तब तक सब ठीक रहता है। ज्योंही वह साल्टन होते हैं, फैमिली बनाते हैं और क्वार्टर में रहने लगते हैं, उनका जीवन नष्ट हो जाता है। निश्छल करमा के अंदर इसका भय पैठ गया है।

    कहानी में एक सपने की बात है। आदमपुर टिसन पर शायद पहली ही रात को जब वह चूने और वार्निश की गंध से परेशान है, एक सपना आता है। सपने में धड़धड़ाता हुआ इंजिन उसके ऊपर से गुजर जाता है। उसका सर अलग छिटक जाता है, और दोनों पाँव अलग। दोनों पाँवों को बटोर कर देखता है कि यह तो एंटोनी ‘गाट’ साहब के बरसाती जूते का जोड़ा है - ‘गम बोट’। करमा इस सपने की बात शुरू करते ही बाबू से डाँट सुनता है। यूँ, यह सपना अगर नहीं भी होता तो कथानक पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता, लेकिन कथा-कहानी में कई बार चीजें संकेत करने के लिए भी होती हैं। कहते हैं, अपने मरने का स्वप्न शुभफलदायी होता है। वास्तव में यह स्वप्न यह संकेत है कि करमा का जीवन बदलने वाला है, इन रेल पटरियों से उतरने वाला है।

    रेणु ध्वन्यात्मक बिम्बों के अद्भुत चितेरे हैं। इस कहानी में भी ध्वनियों के अर्थ व संदर्भ हैं। ध्वनियों में भी कथ्य अभिव्यक्ति पाता है। रेल की सीटी, जहाज का भोंपू - भों-ओं-ओं, तार की घंटी, गार्ड साहब की सीटी, घटही गाड़ी की अलग चीख - सी ई ई..., ‘इसपेसल’ के ‘कल’ की आवाज, टिटिहरी और चील की पुकारें। सिंगल (सिगनल) की ध्वनियाँ...। रेणु की इस कहानी में तो कुत्ता भी भौंकता नहीं, ‘बुफ’, ‘बुफ’ करता है। रिलिफिया से साल्टन बने गोपाल बाबू के फैमिली क्वार्टर के कमरे से भी रात को करमा ध्वनियाँ सुनता है और सिहरता है - ‘गों-गों’, फों-फों, मिनमिनाना, चीखना, चिल्लाना....। बाबुओं के किसिम-किसिम के खर्राटों का विवरण मजेदार है। अलग-अलग स्थितियों और प्रसंगों में पाठक इन ध्वनियों के अलग-अलग अर्थ-संकेत ग्रहण करता है।

    इस कहानी में शुरू से आखिर तक विनोद और परिहास का जबरदस्त पुट है। यह कहने में कोई हिचक नहीं कि इस एक गुण या प्रभाव के कारण भी यह कृति अमर है। यह हास-परिहास और व्यंग्य-व्यंजना इतना स्वाभाविक, सामयिक (टाइमली) और सुस्थापित है कि स्थान-स्थान पर, बल्कि लगभग निरंतरता में पाठक विभोर होता रहता है। व्यंग्य-विनोद कहानी की भाषा में ही रचा-बसा है। यह हास-परिहास मुख्य पात्र करमा उर्फ करमचन के आत्मावलोकन और कहीं-कहीं आत्महीनता से भी पैदा होता है - ‘‘करमा उठकर ताखे पर रखे हुए आईने में अपना मुँह देखने लगा। उसने ‘अ-जू-ऊ-ऊ-बा’ कहकर देखा। छिः उसके होंठ तीतर के चोंच की तरह ....।’’ ‘‘करमा ने ताखे पर रखे आईने में फिर अपना मुखड़ा देखा। उसने आँखें अधमुँदी करके दाँत निकाल कर हँसते हुए मस्तान बाबा के चेहरे की नकल उतारने की चेष्टा की - ‘मस्त रहो!... सदा आँख-कान खोलकर रहो। ...धरती बोलती है। गाछ-बिरिछ भी अपने लोगों को पहचानते हैं। ...है-है-है...मस्त रहो। ...', करमा को क्या पता कि बाबू पीछे खड़े होकर सब तमाशा देख रहे हैं। बाबू ने अचरज से पूछा - ‘तुम जगे-जगे खड़े होकर भी सपना देखता है?... कहता है कि गाँजा नहीं पीता?’’ कहीं-कहीं चुटीली व्यंजक उक्तियों का कमाल देखते ही बनता है - ‘‘बौमा का मिजाज तो इतना खट्टा था कि बोली सुनकर कड़ाही का ताजा दूध फट जाए।'’ ‘'लखपतिया टिसन का नाम कितना जब्बड़ है! मगर टिसन पर एक सत्तु-फरही की भी दुकान नहीं।’’ ‘बस नाम ही आदमपुरा है - आमदनी नदारद। सात दिन में दो टिकट कटे हैं। और सिर्फ पाँच पैसेन्जर उतरे हैं, तिसमें दो बिना टिकट के।’ और यह ध्वनि-चित्रण से झरता हास्य देखिए - ‘‘चलो, बाबू को फिर नींद आ गई। बाबू की नाक ठीक बबुआनी आवाज में ही डाकती है। पैटमान जी तो लगता है लकड़ी चीर रहे हैं। गोपाल बाबू की नाक बीन जैसी बजती थी - सुर में।  असगर बाबू का खर्राटा....; और सिंघ जी फुफकारते थे, और साहू बाबू नींद में बोलते थे - ए, डाउन दो, गाड़ी छोड़ा...!''

    रेणु के यहाँ वस्तुएँ हैं किस्म-किस्म की, और उतने ही विविध विवरण हैं। रेल यात्रा, सहयात्री, प्लेटफार्म आदि अनेक कहानियों और उपन्यासों में मिल जाएँगे। इस कहानी में रेलवे की भीतरी व्यवस्था खुल रही है। कई पाठक पहली बार रिलिफिया बाबू से परिचित होंगे। रेल से जुड़ी अलग से पूरी एक शब्दावली उपस्थित है। केवल आदमपुर स्टेशन ही नहीं, कटिहार-मनिहारी घाट रेल सेक्शन के कई छोटे-बड़े स्टेशनों और उनसे जुड़ी चीजों के प्रामाणिक विवरण दिए गए हैं। ‘घटही गाड़ी’, यानी ऐन घाट तक जाने वाली गाड़ी, और उससे समयाबद्ध जहाज जो उस पार साहेबगंज की तरफ जाता है, से पाठक परिचय ही प्राप्त नहीं करता, उनसे एक जुड़ाव भी अनुभव करता है।

    कुछ बड़े सुंदर दृश्य-बिंब रेणु जी ने उकेरे हैं - ‘मगर सबसे ज्यादा आती है मनिहारी घाट टीसन की याद। एक तरफ धरती, दूसरी ओर पानी। इधर रेलगाड़ी, उधर जहाज। इस पार खेत-गाँव-मैदान, उस पार साहेबगंज-कजरौटिया का नीला पहाड़। नीला पानी- सादा बालू! .... तीन एक, चार-चार महीने तक तीसों दिन गंगा में नहाया है करमा। चार ‘जनम तक’ पाप का कोई असर तो नहीं होना चाहिए! .... मछुए जब नाव से मछलियाँ उतारते तो चमक के मारे करमा की आँखें चौंधिया जातीं। .... रात में उधर जहाज चला जाता - धू-धू करता हुआ। इधर गाड़ी छकछकाती हुई कटिहार की ओर भागती। अजू साह की दुकान की झाँपी बंद हो जाती तब घाट पर मस्तान बाबा की मंडली जुटती ...।'

    करमा जिस गंध का, अजीब गंध का पीछा करता आया, वह आखिरकार उसे सरसतिया की माँ की गोद में पहुँचा देती है, और मानो उसकी यह लम्बी लेकिन अनजानी खोज पूर्ण होती है। यह ममता-माया को जीवन में प्रमुखता देने वाली उच्च मानवीय सरोकारों की कहानी है जिसका एक संदेश यह भी है कि जीवन में नई अर्थवत्ता के लिए ‘सालटन’, बनी-बनाई पटरियों को छोड़ना पड़ता है।       - शिवदयाल

(बनास जन के रेणु विशेषांक में प्रकाशित.)



शिवदयाल

हिन्दी के समकालीन सृजनात्मक एवम् वैचारिक लेखन के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर। दो उपन्यास, कहानी संग्रह, निबंध संग्रह,  बिहार पर केंद्रित दो पुस्तकें, लोकतंत्र एवम् राजनीति पर पुस्तक समेत दर्जनों वैचारिक लेख-निबंध, कविताएं, कहानियां, समीक्षाएं आदि प्रकाशित। उपन्यास ' एक और दुनिया होती ' के मराठी अनुवाद सहित कई रचनाओं का मराठी, उर्दू, अंग्रेजी आदि भाषाओं में अनुवाद। ' विकास सहयात्री ', ' बाल किलकारी ' सहित अनेक पत्रिकाओं का संपादन। 

संपर्क : 101, अनंत विकास अपार्टमेंट, वेद नगर, रुकुनपुरा, बेली रोड, 

पटना - 800014.

मो : 9835263930

sheodayallekhan@gmail.com

Saturday, 17 September 2022

 नई पुस्तक, निबंध संग्रह -  'स्वतंत्र हुए स्वाधीन होना है', प्रकाशक - प्रलेक प्रकाशन, मुंबई (फोन 7021263557)। पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध।

इस पुस्तक में लेखक का बहुआयामी प्रबुद्ध चिंतन राजनीति, धर्म, दर्शन, साहित्य के साथ ही सामयिक संदर्भों और सरोकारों से जुड़े अभिज्ञानधर्मी लेख-निबंधों में अत्यंत सशक्त शैली में प्रकट हुआ है। सांस्कृतिक समीक्षा और सभ्यतामूलक विमर्श के क्षेत्र में यह एक विशिष्ट कृति है जो पाठक के सोच के दायरे को बढ़ाकर उसकी चिंतनशीलता को उच्चतर भाव-भूमि पर प्रतिष्ठापित करती है।

'स्वतंत्र हुए स्वाधीन होना है' पुस्तक में स्वाधीनता, स्वराज, लोकतंत्र और विऔपनिवेशिकीकरण जैसी जटिल और संश्लिष्ट संकल्पनाओं पर समकालीन और सामयिक वैश्विक तथा स्थानीय संदर्भों एवं परिस्थितियों में नितांत नवीन एवं मौलिक दृष्टि से विचार किया गया है। इस पुस्तक में संकलित निबंधों में साहित्यालोचन भी है, सांस्कृतिक समीक्षा भी। यही नहीं, नई विश्व व्यवस्था के लिए सभ्यतामूलक विमर्श की आधारभूमि भी यह पुस्तक प्रस्तुत करती है।


Saturday, 11 June 2022


    सार्वकालिक प्रासंगिकता के कवि नागार्जुन         

                      - शिवदयाल

नागार्जुन जनसाधारण की भाषा में क्लासिक रचने वाले कवि हैं। कवि-कुल में वह लोक के सबसे सशक्त प्रतिनिधि हैं। वह खुद भी खुद को जनकवि कहते हैं। वह बोलचाल, रहन-सहन, वेशभूषा, और जीवन-दृष्टि के लिहाज से भी भारत की आम जनता के प्रतिनिधि हैं। अपनी फक्कड़ी और घुमक्कड़ी से भी उन्होंने लोक को आत्मसात किया है जो उनकी काव्य भाषा को एकदम अलग मौलिक व्यक्तित्व प्रदान करता है। नागार्जुन की काव्य भाषा उनकी लोकप्रियता का सबसे महत्वपूर्ण कारक है। बोलचाल की भाषा को उन्होंने काव्यात्मक उत्कर्ष प्रदान किया, इस प्रकार अपनी कविता में उन्होंने शास्त्र और लोक का अंतर मिटा दिया। आधुनिक हिंदी कविता को यह उनकी सबसे बड़ी देन है।

नागार्जुन स्वातंत्र्यचेता कवि हैं। उन्होंने किसी की अधीनता स्वीकार नहीं की -  न व्यक्ति की, न दल की, न सत्ता की, न ही विचारधारा की। वे सदा जनता के साथ खड़े रहे, जनता का पक्ष ही उनका पक्ष रहा। जनता का दुःख-दर्द और कष्ट-भोग उनका प्रमुख सरोकार रहा। शायद इसीलिए वह अपने समय और समाज के अत्यंत प्रखर आलोचक कवि हैं। जीवन स्थितियों की वह निर्मम आलोचना करते हैं, इसके लिए वे प्रभावी, कभी-कभी हतप्रभ कर देने वाली वक्रोक्तियों का 'विट' या विनोद के रूप में इस्तेमाल करते हैं। उनके विट में देश-काल की विडंबनाएं चित्रित होती हैं। उनकी राजनीतिक कविताओं में इसका अद्भुत रूप देखने को मिलता है। उनकी राजनीतिक कविताओं की विशेषता यह है कि कवि का स्वर मानो आमजन के स्वर में मिल जाता है, कवि मानो जनता की वाणी में बोलने लगता है। भारत के राजनीतिक वर्ग पर नागार्जुन ने बेहद तीखी, विचलित करने वाली व्यंग्योक्तियों का प्रयोग किया है। उन्होंने राजनीतिक परिस्थितियों पर जो तात्कालिक काव्यात्मक प्रतिक्रिया दी, वह भी बेलगाम सत्ता के विरोध की सार्वकालिक प्रासंगिक अभिव्यक्ति बन गई। 'शासन की बंदूक', 'मोर ना होंगे.. उल्लू होंगे', 'पुलिस अफसर' जैसी कविताएं इसका प्रमाण हैं।

अपनी जनपक्षधरता के कारण नागार्जुन निरे शुष्क कवि नहीं है। उनकी कविताएं काव्य में अभिधा की शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। सीधे अभिधा में कही गई बात में भी वे अपूर्व रस-सृष्टि करते हैं। शायद ही उनकी ऐसी कोई कविता हो जिसमें रस-भंग हुआ हो। 

उनकी राजनीतिक कविताएं अत्यंत लोकप्रिय हुई हैं, लेकिन नागार्जुन एक संपूर्ण कवि हैं। तीव्र सौंदर्यानुभूति और प्रखर इतिहास बोध उनकी कविता की पहचान है - इनके अभाव में क्लासिक नहीं रचा जा सकता। कथ्य, शिल्प और भंगिमा की दृष्टि से भी उनकी कविताओं का एक विशाल परास है, रेंज है - 'बादल को घिरते देखा', 'कालिदास', 'सिंदूर तिलकित भाल', 'गुलाबी चूड़ियां', 'पांच पूत भारत माता के', 'बहुत दिनों के बाद', 'मेरी आभा है इसमें', 'हरिजन गाथा' से लेकर 'ऋतु संधि' जैसी अमर रचनाएं नागार्जुन की विलक्षण काव्य प्रतिभा का प्रमाण हैं। उन्होंने गांधीजी, लेनिन, नेहरू, भारतेंदु, रवि ठाकुर, इंदिरा गांधी से लेकर कांशीराम और मायावती पर ही नहीं लिखा, अपने प्रिय गीतकार शैलेंद्र पर भी लिखा। उन्होंने तेलंगाना, सर्वोदय और संपूर्ण क्रांति पर भी लिखा। चीनी आक्रमण के समय 'पुत्र हूं भारत माता का..' लिखा तो बेलछी नरसंहार पर भी लिखा।

नागार्जुन ने रचनात्मक स्तर पर, और कवि की भूमिका के स्तर पर भी अपना अलग मूल्य-मान स्थापित किया। वे अपने समकालीनों के लिए ही चुनौती नहीं बने रहे, बल्कि परवर्ती पीढ़ी के रचनाकारों के लिए भी चुनौती बने हुए हैं। (प्रभात खबर, 11 जून 2022 में प्रकाशित)

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